सेंदरा वीरों ने चार हिरण, तीन सूअर व एक खरगोश शिकार कर लिया, वनविभाग ने किया इनकार

वनविभाग की कड़ी सुरक्षा के बावजूद सेंदरा वीरों ने दलमा जंगल में चार हिरण, तीन सुअर और एक खरगोश का शिकार. हालांकि वन विभाग ने किसी भी शिकार होने से इनकार किया है

दलमा में सेंदरा पर्व मनाने अलग-अलग रास्तों से घुसे थे कोल्हान के आदिवासी

jamshedpur.

वनविभाग की कड़ी सुरक्षा व सघन गश्ती के बावजूद सेंदरा वीरों ने सोमवार को आठ जंगली जानवरों का शिकार किया. फदलोगोड़ा क्षेत्र में तीन हिरण, तीन सूअर और पटमदा क्षेत्र से एक हिरण व एक खरगोश का शिकार कर सेंदरा वीर वनविभाग की नजरों से बचकर निकल गये. दलमा के जंगल में अलग-अलग स्थानों से कोल्हान के सेंदरा वीर घुसे थे. हालांकि में वन विभाग ने दलमा में किसी भी शिकार होने का इनकार किया है. वन विभाग ने जंगली पशुओं को बचाने व उन्हें घने जंगलों की ओर भगाने की कोई कसर बाकी नहीं रखा था. लेकिन उनसे चूक यह हुई कि जहां उन्हें शिकार का तनिक भी अंदाजा नहीं था, वहीं सेंदरा वीरों ने आठ जंगली जानवरों को शिकार कर लिया. फदलोगोड़ा क्षेत्र में शिकारी आते जरूर थे, लेकिन पिछले 6-7 सालों में कभी सफल नहीं हो पाये थे. वे अक्सर बैरंग ही लौट जाते थे.

सेंदरा वीरों ने वन विभाग को खूब छकाया

झारखंड, ओडिशा व कोल्हान के विभिन्न क्षेत्रों से आये सेंदरा वीरों को वन विभाग की सख्ती का अंदाजा पहले से ही था. इसलिए उन्होंने भी वन विभाग से बचने की रणनीति बनायी. सेंदरा वीर पिकअप वैन में झूंड बनाकर देर शाम को आये और कहीं सड़क किनारे रुकने के बजाये सीधे जंगलों की ओर रुख किया. ताकि वन विभाग को लगे कि किसी के आने का पता नहीं चले. सेंदरा वीरों का रणनीति काम आया. दलमा तराई से सटे किसी भी गांव में उनका एक भी पिकअप वैन या मोटरसाइकिल तक नहीं दिखा. जिससे वन विभाग को लगा कि सेंदरा वीर का आना कम हुआ है. बस यहीं वे मात खा गये. विभाग के अधिकारी व वन रक्षी मेन रोड पर घूमते रहे और सेंदरा वीर अपना काम करके चुपचाप चलते बने.

इस साल वन विभाग पहाड़ी पर ज्यादा मुस्तैद दिखा

डिमना डैम के समीप भादूडीह, बोंटा, चिमटी, पोड़ाखूंटा, बांधडीह, पहाड़ी के ऊपर कोंकादासा आदि जगहों पर वन विभाग व इको विकास समिति के सदस्य लगातार गश्ती कर दिखे. पूरे पहाड़ वन विभाग लगातार पिकअप वैन, सुमो, स्कॉर्पियो समेत अन्य लग्जरी वाहन गश्ती कर रहा था. दलमा पहाड़ के ऊपर में हर 10-15 मिनट में गश्ती वाहन घूम रहा था. वन विभाग के वरीय अधिकारी भी दलमा पहाड़ पर काफी सक्रिय दिखे. लेकिन घने जंगल की ओर उनका पहुंचना संभव नहीं था. जहां सेंदरा वीर बेफिक्र होकर सेंदरा पर्व मना रहे थे. घने जंगल में भी वन विभाग व सेंदरा वीरों के बीच आंख मचौनी का खेल चलता रहा. सेंदरा वीरों ने पहाड़ी में मुख्य कच्चा रास्ता को छोड़ दिया था.

सेंदरा को लेकर क्या कहते हैं लोग

इस बार सेंदरा वीरों को दिनभर कड़ी मशक्कत करने का इनाम मिला है. कई जगहों से जंगली सूअर और हिरण को मारने की जानकारी मिली है. सेंदरा वीर घने जंगल में शिकार खेलने आये हैं तो एक-दो जंगली जानवरों को तो शिकार करते ही हैं. लेकिन पिछले कुछ वर्षों की तुलना में इस बार शिकार अधिक हुआ.

-राकेश हेंब्रम, दलमा राजा……………………सेंदरा वीर जंगल में सेंदरा परंपरा को निर्वाह करने के लिए आते हैं. इस दौरान जंगली जानवर मिले या नहीं मिले यह मायने नहीं रखता. वे कभी हार नहीं मानते हैं. फिर अगले साल इस मकसद से आते हैं कि इस बार कोई न कोई पशु हाथ लग ही जायेगा. इस तरह कभी वे अपने मकसद में सफल हो जाते हैं और कभी असफल.

-धानो मार्डी

……………………..घने जंगल में सेंदरा करना कोई बच्चों का खेल नहीं है. जंगल में वही घूम या विचरण कर सकता है जो शारीरिक रूप से स्वस्थ हो. सेंदरा स्वस्थ व निरोग शरीर वालों की पहचान है. हाल के दिनों में सेंदरा केवल परंपरा निर्वहन तक रह गया है. कभी-कभी सेंदरा परंपरा निर्वाह के दौरान एक-दो पशुओं का शिकार हो जाता है. लेकिन हर दिन नहीं, केवल एक ही दिन. वो भी सेंदरा पर्व के दिन.

– लिटा बानसिंह

…………………………..दिसुआ सेंदरा में परंपरा का निर्वहन होता है. लेकिन ओडिशा, बंगाल व कोल्हान के विभिन्न क्षेत्रों से जो लोग आते हैं. वे विशुद्ध रूप शिकार खेलने की आते हैं. वह अलग बात है कि कभी-कभी शिकार नहीं मिलता है. लेकिन वे फिर दूसरे साल अपना किस्मत अजमाने आते हैं. मैं पिछले चार दशक से सेंदरा पर्व में आ रहा हूं.

-लाल सिंह गागराई………………………………………….

सेंदरा से दूर भाग रही है युवा पीढ़ी

हाल के 10-15 सालों में सेंदरा परंपरा में बहुत बदलाव देखने को मिला है. सेंदरा परंपरा को आगे ले जाने के लिए नयी पीढ़ी नहीं जुड़ रही है. सेंदरा परंपरा को निर्वाह करने के लिए कोई नया चेहरा नहीं दिख रहा है. वर्तमान समय में वहीं लोग सेंदरा परंपरा को निर्वहन करने आ रहे हैं जो पहले से आते रहे हैं. सच्चाई तो यह है कि वर्तमान समय में कई आदिवासी घरों में तीर-धनुष तक नहीं है. वे खुद को आदिवासी तो मानते हैं, लेकिन उनका रहन-सहन व कार्यशैली दूर-दूर तक आदिवासियों वाला बिलकुल नहीं है.

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By Sanjay prasad

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