जिसे जब चाहे मौत का फरमान सुनाने वाला असीम हुआ बेबस, उम्र ढलते ही दस्ता और हथियार छूटे, पढ़ें झारखंड-बंगाल सीमा पर लाल आतंक के पतन की कहानी

26 साल तक झारखंड-पश्चिम बंगाल में आतंक का पर्याय रहे खूंखार नक्सली असीम मंडल का साम्राज्य अब ढह गया है. उम्र ढलने और साथियों के साथ छोड़ने के बाद वह बिल्कुल असहाय हो गया. उसकी गिरफ्तारी के साथ ही इस क्षेत्र से नक्सलवाद का लगभग सफाया हो गया है.

घाटशिला : झारखंड और पश्चिम बंगाल की सीमा पर बीते 26 वर्षों तक बंदूक के दम पर आतंक का पर्याय रहे नक्सली असीम मंडल उम्र ढलने व एक के बाद एक साथियों के साथ छोड़ने के बाद बिल्कुल असहाय हो गया. बीते 17 सितंबर को कोलकाता एसटीएफ ने गिरफ्तार किया, तो उसके पास न हथियार था न उसके साथ नक्सलियों की कोई फौज थी. एक दौर था जब जंगलों में असीम मंडल की तूती बोलती थी. वह दिन हो या रात, खुलेआम कैंप लगाता था. 'जन अदालतें' लगाकर फैसले सुनाता था. उस समय उसके साथ नक्सलियों का बड़ा दस्ता था. युवावस्था के जोश और हथियारों के बल पर वह जो फरमान सुनाता था, वह पत्थर की लकीर माना जाता था. जब वह बंगाल स्टेट कमेटी का सचिव बना, तो संगठन में उसकी अनुमति के बिना पत्ता भी नहीं हिलता था. वहीं, अंत में उसके पास इलाज कराने तक के पैसे नहीं थे.

दलमा से लेकर गुड़ाबांदा तक फैलाया था खूनी साम्राज्य

असीम मंडल ने वर्ष 2000 के बाद झारखंड-बंगाल सीमा के दलमा क्षेत्र, पटमदा, बोड़ाम, एमजीएम, गालूडीह, घाटशिला, धालभूमगढ़, चाकुलिया और दक्षिण क्षेत्र के गुड़ाबांदा-डुमरिया तक अपनी पैठ बनायी थी. वर्ष 2003-2004 आते-आते संगठन में उसका प्रभाव तेजी से बढ़ा. पहले वह जोनल सचिव बना और बाद में बंगाल स्टेट कमेटी का कमान संभाला. पूर्वी सिंहभूम के इन बीहड़ इलाकों में उसने लाल आतंक बरपाया. वह खुद हमेशा अपने पास एके-47 राइफल रखता था. सटीक निशाना लगाने में माहिर माना जाता था. दो दशकों से अधिक समय तक इस क्षेत्र को दहलाने के बाद वर्ष 2018 में एमजीएम के डालापानी में सीआरपीएफ के साथ हुई मुठभेड़ के बाद इलाके को छोड़कर सारंडा भाग गया था. उस समय उसकी टीम में 15 सक्रिय नक्सली सदस्य थे.

जंगलों में कैंप करता असीम मंडल (फाइल फोटो).

ऐसे ढहता चला गया नक्सलियों का पूरा किला

बदलते समय के साथ पुलिसिया दबाव बढ़ता गया, ग्रामीण जागरूक होते गये और जंगलों में सड़कों व मोबाइल नेटवर्क का जाल बिछने से नक्सलियों की पकड़ कमजोर होती चली गयी. नये युवाओं का जुड़ना बंद हो गया और संगठन ताश के पत्तों की तरह बिखरने लगा.

रंजीत और झरना का सरेंडर : उसके पतन की शुरुआत 25 जनवरी 2017 को हुई, जब असीम की टीम से अलग होकर सांसद सुनील महतो हत्याकांड के मुख्य शूटर रंजीत पाल उर्फ राहुल और उसकी नक्सली पत्नी झरना ने हथियारों के साथ कोलकाता पुलिस मुख्यालय में आत्मसमर्पण कर दिया.

दिग्गजों की गिरफ्तारी और सरेंडर : इसके बाद बंगाल में 15 लाख की इनामी बेला की गिरफ्तारी, दलमा तराई में 15 लाख के इनामी मदन महतो, 5 लाख के इनामी सागर उर्फ विरेन सिंह, दो लाख की इनामी मीना और डॉक्टर प्रदीप मंडल का पकड़ा जाना संगठन के लिए बड़े झटके साबित हुए. वहीं, बंगाल में हथियार के साथ पुष्पा उर्फ शकुंतला के सरेंडर के बाद 15 लाख के इनामी राम प्रसाद मार्डी उर्फ सचिन, 5 लाख के इनामी मीता और 2 लाख की इनामी बुलू ने भी आत्मसमर्पण कर दिया. इन सबके बीच हार्डकोर नक्सली श्याम सिंकू की बीमारी से मौत हो गयी, जबकि प्रकाश उर्फ अतुल और समीर सोरेन मुठभेड़ में मारे गये. इन तमाम घटनाओं ने असीम मंडल की कमर तोड़ दी.

असीम मंडस (फाइल फोटो).

अंत में बिल्कुल अकेला पड़ गया सरगना

संगठन के पूरी तरह बिखर जाने के बाद अंतिम समय में असीम मंडल के साथ एक भी नक्सली सदस्य नहीं बचा था. वह दोबारा अपने पुराने ठिकाने दलमा से घाटशिला के बीहड़ों में लौटा था, लेकिन पुलिस की लगातार दबिश के आगे उसकी एक नहीं चली. असीम मंडल की गिरफ्तारी के साथ ही इस क्षेत्र से नक्सलवाद का लगभग पूरी तरह सफाया हो गया है. हालांकि अब भी कुछ जगहों पर छिटपुट रूप से अन्य नक्सलियों के छिपे होने की सूचनाएं सामने आ रही हैं.

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लेखक के बारे में

By मो. युनूस परवेज

मो. युनूस परवेज वर्ष 1995 से पत्रकारिता कर रहे हैं. उन्होंने घाटशिला महाविद्यालय और रांची विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में स्नातक और राजनीतिक विज्ञान ऑनर्स की डिग्री हासिल की है. इनकी राजनीति, अपराध, नक्सलवाद, खेल, शिक्षा और खेती किसानी की खबरों में विशेष रुचि है. डिजिटल जर्नलिज्म में 5 साल का अनुभव है.

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