जमशेदपुर : कृष्णापुर की मिट्टी में पला-बढ़ा एक युवक, जिसकी शुरुआती पहचान गांव और खेती-किसानी से जुड़ी थी. आंखों में कुछ कर गुजरने का सपना था, लेकिन मंजिल आसान नहीं थी. राजनीति की राह चुनी तो पहली कोशिश में हार मिली. दूसरी बार भी जनता ने साथ नहीं दिया. दो चुनावी हार के बाद भी कदम नहीं रुके. गांव-गांव जाना, लोगों से मिलना और अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करना जारी रहा. फिर 2009 में बहरागोड़ा की जनता ने विधानसभा भेजा. इसके पांच साल बाद यही राजनीतिक सफर जमशेदपुर से दिल्ली की संसद तक पहुंच गया. आज विद्युत वरण महतो जमशेदपुर से लगातार तीन बार सांसद हैं और लगातार पांचवीं बार संसद रत्न पुरस्कार हासिल करने वाले इकलौते सांसद हैं.
आदित्यपुर के कृष्णापुर में हुआ था जन्म
विद्युत वरण महतो का जन्म 15 फरवरी 1963 को आदित्यपुर के कृष्णापुर गांव में हुआ था. ग्रामीण परिवेश में जीवन की शुरुआत हुई. खेती से भी उनका जुड़ाव रहा. गांव का जीवन, लोगों की समस्याएं और क्षेत्र की जरूरतें उनके शुरुआती जीवन का हिस्सा रहीं. यही जमीन आगे चलकर उनकी राजनीति की भी आधारभूमि बनी. जब झारखंड अलग राज्य की मांग को लेकर आंदोलन तेज था, तब युवा विद्युत वरण महतो भी इस राजनीतिक उथल-पुथल से जुड़े. झारखंड की पहचान, अधिकार और अलग राज्य की मांग ने उन्हें राजनीति की ओर खींचा.
झामुमो के साथ शुरू किया था राजनीतिक सफर
सांसद विद्युत वरण महतो ने झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के साथ अपना राजनीतिक सफर शुरू किया. आंदोलन की राजनीति में गांव-गांव घूमते हुए लोगों से जुड़ाव बढ़ा. इसी दौरान उनकी पहचान झामुमो के कई प्रमुख नेताओं से हुई. पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन भी उन नेताओं में शामिल थे, जिनके साथ उन्होंने लंबे समय तक राजनीतिक सफर तय किया.
बहरागोड़ा से लड़ा चुनाव, मिली हार
लेकिन आंदोलन से चुनावी राजनीति तक का रास्ता आसान नहीं था. साल 2000 में बहरागोड़ा विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा. जनता ने मौका नहीं दिया. हार मिली. पांच साल बाद 2005 में फिर चुनाव मैदान में उतरे, लेकिन इस बार भी सफलता नहीं मिली. लगातार दो चुनावी हार किसी भी नेता के राजनीतिक हौसले को तोड़ सकती थी, लेकिन विद्युत वरण महतो ने हार को अपनी राह का अंत नहीं बनने दिया.
9 साल बाद मिली जीत
वह क्षेत्र में सक्रिय रहे. संगठन से जुड़े रहे और लोगों के बीच अपनी पहचान मजबूत करते रहे. आखिरकार 2009 में बहरागोड़ा की जनता ने उन्हें विधानसभा भेज दिया. वर्षों के इंतजार के बाद मिली यह जीत सिर्फ एक चुनाव जीतना नहीं था, बल्कि लगातार संघर्ष के बाद जनता के भरोसे की जीत थी. विधायक बनने के बाद उनकी राजनीतिक पहचान और मजबूत हुई.
झामुमो छोड़कर थामा था भाजपा का दामन
वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले उनके राजनीतिक जीवन में एक बड़ा मोड़ आया. उन्होंने झामुमो छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया. भाजपा ने उन्हें जमशेदपुर लोकसभा सीट से मैदान में उतारा. नया दल, बड़ा चुनाव और सामने मजबूत राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी—चुनौती बड़ी थी. लेकिन जनता ने उनका साथ दिया. उन्होंने तत्कालीन सांसद अजय कुमार को हराया और पहली बार लोकसभा पहुंचे.
चंपाई सोरेन को हराकर दूसरी बार पहुंचे लोकसभा
2014 की जीत के बाद जमशेदपुर की राजनीति में उनका प्रभाव लगातार बढ़ता गया. वर्ष 2019 में उनके सामने झामुमो के चंपाई सोरेन थे. कभी एक ही राजनीतिक मंच पर साथ चलने वाले दोनों नेता अब चुनावी मैदान में आमने-सामने थे. इस मुकाबले में विद्युत वरण महतो ने चंपाई सोरेन को 3,02,090 मतों के बड़े अंतर से हराया और लगातार दूसरी बार लोकसभा पहुंचे. वर्ष 2024 में भी जनता ने उन पर भरोसा जताया. झामुमो के समीर कुमार मोहंती को 2,59,782 मतों के अंतर से हराकर विद्युत वरण महतो ने जमशेदपुर से लगातार तीसरी बार जीत दर्ज की. दो चुनावी हार से शुरू हुआ सफर अब लोकसभा में जीत की हैट्रिक तक पहुंच चुका था.
संसद में प्रदर्शन के लिए पांचवीं बार मिला संसद रत्न
राजनीतिक सफर की सबसे बड़ी उपलब्धियों में अब संसद रत्न पुरस्कार की लगातार पांचवीं उपलब्धि भी जुड़ गयी है. लोकसभा में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए विद्युत वरण महतो को वर्ष 2026 का संसद रत्न पुरस्कार प्रदान किया गया. खास बात यह है कि वह लगातार पांच बार यह सम्मान पाने वाले इकलौते सांसद हैं.
कभी जिनके साथ थे, बाद में उनके साथ लड़ा चुनाव
उनकी राजनीतिक यात्रा का एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि जिस झामुमो से उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की थी, उसी दल के नेताओं से बाद के वर्षों में उनका सीधा चुनावी मुकाबला हुआ. कभी आंदोलन में साथ चलने वाले चंपाई सोरेन से लेकर बाद में समीर कुमार मोहंती तक, जमशेदपुर की चुनावी राजनीति में उनके सामने कई चेहरे आये, लेकिन जीत का सिलसिला जारी रहा.
