जयपाल सिंह मुंडा की विरासत को नई पहचान दे रहीं बेटियां, हॉकी और तीरंदाजी में देश-विदेश तक बनाई पहचान

झारखंड की बेटियां गांव की पगडंडी से निकलकर अंतर्राष्ट्रीय हॉकी मंच पर अपनी पहचान बना रही हैं. जानिए कैसे जयपाल सिंह मुंडा की विरासत को ये बेटियां आगे बढ़ा रही हैं.

सुनील कुमार की रिपोर्ट

Sports Day Special: राष्ट्रीय खेल दिवस पर झारखंड की महिला हॉकी की कहानी सिर्फ पदकों और खिलाड़ियों की सूची नहीं है. यह उस बदलाव की कहानी है, जिसमें गांव की बेटियों ने सीमित संसाधनों के बीच मेहनत और जुनून के दम पर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंच पर अपनी पहचान बनायी है. मरांग गोमके जयपाल सिंह मुंडा ने करीब एक सदी पहले जिस हॉकी परंपरा की नींव रखी थी, उसे आज झारखंड की बेटियां नयी ऊंचाई दे रही हैं. खेल दिवस के अवसर पर प्रस्तुत है

जयपाल सिंह मुंडा से शुरू हुई हॉकी की गौरवशाली परंपरा

झारखंड की धरती हमेशा से हॉकी की जननी रही है. झारखंड और हॉकी का रिश्ता करीब एक सदी पुराना है. मरांग गोमके जयपाल सिंह मुंडा से शुरू हुई यह गौरवशाली परंपरा आज नई पीढ़ी की बेटियों के हाथों नए मुकाम तक पहुंच रही है. 1928 एम्सटर्डम ओलिंपिक में भारत को स्वर्ण पदक दिलाने वाली टीम की कप्तानी करने वाले जयपाल सिंह मुंडा ने झारखंड की हॉकी को दुनिया के मानचित्र पर पहचान दिलाई.

इसके बाद माइकल किंडो, सिल्वानुस डुंगडुंग, मनोहर टोपनो और विमल लकड़ा जैसे खिलाड़ियों ने पुरुष हॉकी की इस विरासत को आगे बढ़ाया. अब सिमडेगा, खूंटी और गुमला के गांवों से निकलने वाली बेटियां इस परंपरा को नई पहचान दे रही हैं.

गांव की मिट्टी से अंतर्राष्ट्रीय मंच तक बेटियों का परचम

सिमडेगा, खूंटी और गुमला जैसे जिलों के गांवों और खेतों की मिट्टी से निकलकर झारखंड की बेटियों ने भारतीय महिला हॉकी टीम तक का सफर तय किया है. सीमित संसाधनों के बावजूद इन खिलाड़ियों ने अपनी प्रतिभा और मेहनत के दम पर देश का प्रतिनिधित्व किया है.

सलीमा टेटे : भारतीय महिला हॉकी टीम की कमान संभालते हुए आज देश का नेतृत्व कर रही हैं.

निक्की प्रधान : 2016 रियो ओलिंपिक में हिस्सा लेकर झारखंड की पहली महिला ओलिंपिक हॉकी खिलाड़ी बनने का गौरव हासिल किया. मार्च 2026 में उन्होंने 200 अंतर्राष्ट्रीय मैच भी पूरे किए.

नई पीढ़ी के सितारे : संगीता कुमारी, ब्यूटी डुंगडुंग, दीपिका सोरेंग और महिमा टेटे जैसी खिलाड़ी भारतीय टीम में अपनी मजबूत पहचान बना रही हैं.

16 वर्षों में महिला हॉकी ने जीते 34 पदक

झारखंड की महिला हॉकी ने पिछले 16 वर्षों में राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में शानदार प्रदर्शन किया है. इस दौरान टीम ने कुल 34 पदक जीते हैं. इनमें 10 स्वर्ण, 11 रजत और 13 कांस्य पदक शामिल हैं.

वर्ग के अनुसार देखें तो जूनियर वर्ग में 14, सब-जूनियर वर्ग में 12 और सीनियर वर्ग में 8 पदक मिले हैं. झारखंड की महिला हॉकी टीम ने वर्ष 2024, 2025 और 2026 में लगातार तीन बार हॉकी इंडिया सब-जूनियर महिला राष्ट्रीय चैंपियनशिप जीतकर हैट्रिक भी लगायी.

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सिमडेगा बनी महिला हॉकी की नर्सरी

सिमडेगा को झारखंड में महिला हॉकी की नर्सरी के रूप में पहचान मिली है. पिछले एक दशक में अकेले सिमडेगा जिले ने दर्जनों राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ी दिए हैं. सलीमा टेटे, नीरू कुल्लू, अल्का डुंगडुंग और रजनी केरकेट्टा जैसी कई प्रतिभाएं इसी मिट्टी से निकलकर राष्ट्रीय स्तर तक पहुंची हैं.

बढ़ रहा खेल का बुनियादी ढांचा

झारखंड में हॉकी को बढ़ावा देने के लिए खेल सुविधाओं और बुनियादी ढांचे का भी विस्तार हो रहा है. रांची में बरियातू, हटिया, एजी कॉम्प्लेक्स और मोरहाबादी में एस्ट्रोटर्फ मैदान तैयार हैं. सिमडेगा और खूंटी में दो-दो एस्ट्रोटर्फ तैयार हैं, जबकि गुमला में एस्ट्रोटर्फ का निर्माण जारी है.

जमीनी स्तर पर भी खिलाड़ियों को तैयार करने का प्रयास जारी है. सिनी जैसी संस्थाओं के सहयोग से 90 से अधिक प्रशिक्षण केंद्रों पर हजारों बच्चों को प्रशिक्षण दिया जा रहा है. इससे ग्रामीण बेटियों को खेल के साथ आत्मनिर्भर बनने का अवसर भी मिल रहा है.

तीन पीढ़ियों ने संभाली हॉकी की विरासत

पुरानी पीढ़ी ने रखी मजबूत नींव

असुंता लकड़ा : भारतीय महिला हॉकी टीम की पूर्व कप्तान रहीं और करीब आठ वर्षों तक राष्ट्रीय टीम की अहम खिलाड़ी के रूप में योगदान दिया. वह 2006 कॉमनवेल्थ गेम्स में रजत पदक जीतनेवाली भारतीय टीम का हिस्सा थीं.

सुमराई टेटे : भारतीय महिला टीम की खिलाड़ी रहीं और 2006 कॉमनवेल्थ गेम्स की टीम में शामिल थीं.

मसिरा सुरिन : भारतीय महिला टीम की खिलाड़ी रहीं और 2006 कॉमनवेल्थ गेम्स में देश का प्रतिनिधित्व किया.

पुष्पा प्रधान : राष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी रहीं और निक्की प्रधान के हॉकी करियर को प्रेरित करनेवाली खिलाड़ियों में शामिल हैं.

ज्योति सुनीता कुल्लू : भारतीय महिला टीम की खिलाड़ी रहीं और 2006 कॉमनवेल्थ गेम्स की टीम का हिस्सा थीं.

मध्य पीढ़ी ने ओलिंपिक तक पहुंचाया नाम

निक्की प्रधान : झारखंड की पहली महिला हॉकी ओलिंपियन हैं. उन्होंने रियो 2016 और टोक्यो 2020 ओलिंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया. वर्ष 2026 में उन्होंने 200 अंतरराष्ट्रीय मैच पूरे किये.

सलीमा टेटे : सिमडेगा से निकलकर भारतीय महिला हॉकी टीम की कप्तान तक का सफर तय किया और झारखंड का गौरव बढ़ाया.

संगीता कुमारी : वर्ष 2022 में सीनियर भारतीय टीम में पदार्पण किया और अब टीम की नियमित खिलाड़ियों में शामिल हैं.

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नई पीढ़ी भी दिखा रही दम

झारखंड की नई पीढ़ी की खिलाड़ियों में ब्यूटी डुंगडुंग, दीपिका सोरेंग, महिमा टेटे, स्वीटी डुंगडुंग, सुनीता कुमारी, संदीपा कुमारी, पुष्पा मांझी, प्रीति बिलुंग, रेजिना कुल्लू, सानिया तिर्की और निपुनता कुल्लू जैसी प्रतिभाएं शामिल हैं.

हॉकी से आगे भी बेटियों ने रचा इतिहास

झारखंड की बेटियों की उपलब्धियां सिर्फ हॉकी तक सीमित नहीं हैं. तीरंदाजी, मुक्केबाजी और लॉन बॉल्स जैसे खेलों में भी खिलाड़ियों ने राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतकर राज्य का नाम रोशन किया है.

तीरंदाजी में भी चमकी झारखंड की बेटियां

दीपिका कुमारी : 2010 कॉमनवेल्थ गेम्स में व्यक्तिगत रिकर्व और टीम रिकर्व, दोनों स्पर्धाओं में स्वर्ण पदक जीता.

लक्ष्मी रानी माझी : 2015 विश्व तीरंदाजी चैंपियनशिप की टीम रिकर्व स्पर्धा में रजत पदक हासिल किया.

मधुमिता कुमारी : 2018 एशियाई खेलों में महिला कंपाउंड टीम के साथ रजत पदक जीता.

कोमोलिका बारी : राष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतकर अपनी पहचान बनायी.

अंकिता भकत : झारखंड की प्रमुख अंतरराष्ट्रीय तीरंदाजों में शामिल हैं.

मुक्केबाजी में अरुणा मिश्रा ने दिलायी पहचान

अरुणा मिश्रा : वर्ष 2004 की विश्व चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतकर झारखंड की महिला मुक्केबाजी को बड़ी पहचान दिलायी.

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लॉन बॉल्स में भी बेटियों का दबदबा

लवली चौबे, रूपा रानी तिर्की, कविता कुमारी और अनामिका लकड़ा ने 2022 राष्ट्रीय खेलों में महिला फोर स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीता. इसी टीम ने महिला पेयर स्पर्धा में रजत पदक भी हासिल किया.

अब गांव की बेटियों के सपनों की कोई सीमा नहीं

झारखंड की बेटियों ने यह साबित कर दिया है कि प्रतिभा को अगर अवसर, प्रशिक्षण और सही मंच मिले, तो गांव की पगडंडियों से निकलकर भी ओलिंपिक और विश्व मंच तक पहुंचा जा सकता है. हॉकी की पुरानी विरासत को आगे बढ़ाती नयी पीढ़ी अब सिर्फ पदक जीतने का सपना नहीं देख रही, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय खेल जगत में झारखंड की पहचान को और मजबूत कर रही है.


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By Deepak

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