जयनारायण
हजारीबाग के ललन प्रसाद सांप्रदायिक सदभावना के प्रतीक बन गये हैं. 45 वर्षों से हिंदू, मुसलिम, सिख और ईसाई समुदाय के बीच धार्मिक सौहार्द्र, प्रेम, भाईचारा और कौमी एकता को मजबूत कर रहे हैं. सहज व्यक्तित्व के कारण सभी धर्म के लोग उन्हें भैया कह कर बुलाते हैं. ललन प्रसाद ने शहर की शांति को भंग करनेवाले उपद्रवी तत्वों का कई बार मुकाबला किया है.
इसमें उन्हें चोटें भी आयीं. यदि शहर के किसी भी क्षेत्र में सामाजिक समरसता को भंग करने की कोशिश होती है, तो सबसे पहले उसके खिलाफ खड़े होनेवालों में हैं ललन प्रसाद. यही वजह है कि सामाजिक संस्था लोक सेवा समिति ने उन्हें ‘झारखंड रत्न’ से सम्मानित किया है. उनका सामाजिक एवं मानवीय व्यक्तित्व हर तबके के लोगों को आकर्षित करता है. पूरे शहर के युवाओं के ललन प्रसाद प्रेरणास्रोत बन गये हैं.
ललन जी कहते हैं कि 1973 में होली के समय दो संप्रदायों में तनाव हो गया. अनियंत्रित भीड़ को नियंत्रित करते समय उनके हाथ में एक धारदार हथियार से चोट लगी, लेकिन वह रुके नहीं और भीड़ को नियंत्रित करके ही माने.
1989 में में भी ऐसा ही एक प्रयास हुआ, तो उन्होंने बिना प्रशासन के सहयोग के शहर को शांत कराया. रात में साइकिल से अकेले घूमे और अमनप्रिय लोगों के साथ बैठक कर इस काम को अंजाम दिया. तत्कालीन डीसी ने रात में घूमने पर उन्हें टोका भी, लेकिन वह अपने काम में लगे रहे. ललन प्रसाद के नेतृत्व में ही लाखे का भव्य मजार शरीफ और हुरहुरू करबला का निर्माण संभव हुआ.
