दुर्जय पासवान
Gumla: पारंपरिक उलगुलान के तहत रूढ़िजन्य जनजाति समन्वय समिति ने संरक्षक सह आईआरएस निशा उरांव के नेतृत्व में गुमला उपायुक्त दिलेश्वर महतो को लिखित ज्ञापन सौंपा है. निशा उरांव ने कहा है कि पारंपरिक उलगुलान की शुरुआत खूंटी जिला से हुई थी. आज उसका विस्तार गुमला जिला में भी किया गया. गुमला जिला के उपायुक्त को जिला के पारंपरिक आदिवासी अगुआ द्वारा ज्ञापन सौंपा गया. आदिवासी समाज के पारंपरिक व्यवस्था (जैसे पड़हा, डोकलो, सोहर इत्यादि) के पदों पर धर्मांतरित आदिवासी नहीं बना रह सकता है. हर पद की धार्मिक और सामाजिक दोनों जिम्मेदारी होती है.
आदिवासी मूल आस्था और संस्कृति को हो रहा गहरा नुकसान
उन्होंने कहा धर्मांतरित आदिवासी सामाजिक जिम्मेदारी तो निभा लेता है, लेकिन धार्मिक जिम्मेदारी नहीं निभा पाता है. इससे आदिवासी मूल आस्था और संस्कृति को गहरा नुकसान हो रहा है. इस विषय पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय समाज के पक्ष में है. एक और सुप्रीम कोर्ट निर्णय के अनुसार बिना ग्राम सभा की अनुमति से चंगाई सभा नहीं की जा सकती है. नई पेसा नियमावली द्वारा ग्राम सभा पर गैर पारंपरिक पद थोपे जा रहे हैं. जैसे कोषाध्यक्ष, अध्यक्ष, सचिव इत्यादि. अतः यह मांग की जा रही है की पांचवीं अनुसूची के ग्राम सभा के पद, पारंपरिक नियमों के अनुसार हो.
मौके पर कई लोग थे मौजूद
उन्होंने आगे कहा इस पारंपरिक उलगुलान की शुरुआत खूंटी जिले में की जा चुकी है. इस उलगुलान में मुंडा, खड़िया, उरांव तथा संथाल समाज के पारंपरिक अगुआ जुड़े हैं. इसकी अगुवाई ‘रूढ़िजन्य जनजाति समन्वय समिति’ द्वारा की जा रही है. मौके पर महेंद्र उरांव कहतो मूली पड़हा, फौदा उरांव दीवान राजी पड़हा, जयराम बेल पड़हा, कलावती उरांव डोकलो खड़िया, अग्नू डोकलो खड़िया, बिरसा उरांव राजी पड़हा प्रार्थना सभा लोहरदगा, सुधु भगत राजी पड़हा प्रार्थना सभा लोहरदगा, कृष्णा उरांव राजी पड़हा प्रार्थना सभा लोहरदगा सहित कई लोग थे.
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