बिशुनपुर: गुमला के बिशुनपुर प्रखंड स्थित रांगे गांव स्थित रंगनाथ धाम न केवल आस्था का प्रमुख केंद्र है, बल्कि अपने साथ एक अनोखी लोककथा भी समेटे हुए है. वर्षों से ग्रामीणों के बीच प्रचलित इस जनश्रुति को आज भी बुजुर्ग बड़े विश्वास के साथ सुनाते हैं. हालांकि, इस कथा का कोई प्रमाणित ऐतिहासिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं है, लेकिन स्थानीय लोगों की आस्था इसे आज भी जीवित रखे हुए है.
ग्रामीणों के अनुसार, प्राचीन काल में टांगीनाथ धाम, रंगनाथ धाम और पलामू किला का निर्माण एक साथ चल रहा था. तीनों निर्माण स्थलों के कारीगरों के बीच यह सहमति बनी थी कि जिसका निर्माण सबसे पहले पूरा होगा. वह दीपक या मशाल जलाकर दूसरे स्थानों को संकेत देगा. जनश्रुति के अनुसार टांगीनाथ धाम में निर्माण कार्य के दौरान एक कारीगर का औजार नीचे गिर गया.
अंधेरे में उसे खोजने के लिए दीपक जलाया गया. दूर से दीपक की रोशनी देखकर रंगनाथ धाम और पलामू किले में कार्य कर रहे कारीगरों को लगा कि टांगीनाथ धाम का निर्माण पूरा हो चुका है. इसके बाद उन्होंने अपना निर्माण कार्य रोक दिया. ग्रामीणों का मानना है कि इसी कारण रंगनाथ धाम और पलामू किले के कुछ हिस्से आज भी अधूरे दिखायी देते हैं.
भले ही इतिहास इस जनश्रुति की पुष्टि नहीं करता हो, लेकिन आज भी रंगनाथ धाम श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का केंद्र बना हुआ है. जहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु भगवान के दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं. विशेषकर सावन, महाशिवरात्रि समेत अन्य धार्मिक अवसरों पर यहां श्रद्धालुओं की लंबी कतारें देखने को मिलती है.
आस्था और विश्वास को जीवंत करता है रंगनाथ धाम
जिप सदस्य पवन उरांव बताते हैं कि स्थानीय श्रद्धालुओं का विश्वास है कि रंगनाथ धाम में सच्चे मन से मांगी गयी मनोकामनाएं भगवान अवश्य पूर्ण करते हैं. यही कारण है कि झारखंड ही नहीं, बल्कि आसपास के जिलों और पड़ोसी राज्यों से भी लोग यहां मत्था टेकने आते हैं.
मंदिर परिसर में भक्ति, श्रद्धा और आध्यात्मिक वातावरण श्रद्धालुओं को विशेष अनुभूति कराता है. ग्रामीणों का कहना है कि रंगनाथ धाम, टांगीनाथ धाम और पलामू किले से जुड़ी यह लोककथा क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है.
इतिहास भले ही कुछ और कहे, लेकिन पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनायी जाने वाली यह कहानी आज भी लोगों की आस्था और लोकविश्वास को जीवंत बनाये हुए है.
