पति को खोया, बेटियों को संभाला और हजारों लोगों तक पहुंचायी स्वास्थ्य सेवा

पति के निधन के बाद दो बेटियों की जिम्मेदारी संभालते हुए जया रेशमा खाखा ने हार नहीं मानी. वर्ष 2005 से स्वास्थ्य सेवा से जुड़ी जया ने गुमला के दुर्गम और आदिवासी बहुल क्षेत्रों तक स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई. मिर्गी के 1,296 मरीजों की पहचान से लेकर करीब आठ लाख लोगों की सिकल सेल एनीमिया जांच तक उनके प्रयास स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में मिसाल बने हैं.

गुमलाः स्वास्थ्य सेवा केवल अस्पताल, दवा और जांच तक सीमित नहीं है. इसके पीछे उन लोगों का समर्पण भी होता है, जो कठिन परिस्थितियों के बीच काम करते हुए समाज के अंतिम व्यक्ति तक स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाने का प्रयास करते हैं. गुमला जिले में स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में ऐसी ही पहचान बना चुकी हैं 52 वर्षीय जया रेशमा खाखा. वर्ष 2005 से राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) से जुड़ी जया वर्तमान में जिला कार्यक्रम प्रबंधक (डीपीएम) के रूप में स्वास्थ्य व्यवस्था को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं.

दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों, सीमित संसाधनों और बड़ी ग्रामीण आबादी के बीच स्वास्थ्य योजनाओं को धरातल तक पहुंचाना आसान नहीं है. इसके बावजूद जया रेशमा खाखा ने लगातार काम करते हुए दूरस्थ और आदिवासी बहुल क्षेत्रों तक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बढ़ाने में योगदान दिया है.

पति के निधन के बाद भी नहीं टूटा हौसला

जया रेशमा खाखा के जीवन में एक ऐसा दौर भी आया, जिसने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया. सड़क दुर्घटना में उनके पति का असामयिक निधन हो गया. उस समय उनके सामने दो छोटी बेटियों की परवरिश की बड़ी जिम्मेदारी थी. परिवार संभालने के साथ नौकरी और सामाजिक दायित्व निभाना उनके लिए बड़ी चुनौती थी. लेकिन उन्होंने परिस्थितियों के सामने हार नहीं मानी. दो बेटियों की परवरिश करते हुए उन्होंने अपनी नौकरी और स्वास्थ्य सेवा के प्रति जिम्मेदारी को जारी रखा. व्यक्तिगत पीड़ा को पीछे छोड़ उन्होंने अपने कार्यक्षेत्र को ही सेवा का माध्यम बना लिया. यही संघर्ष आज उनकी पहचान को केवल एक अधिकारी तक सीमित नहीं रखता, बल्कि उन्हें स्वास्थ्य सेवाओं के लिए समर्पित कर्मी के रूप में स्थापित करता है.

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दुर्गम इलाकों तक पहुंचायी स्वास्थ्य सेवाएं

गुमला का भौगोलिक क्षेत्र पहाड़ी और दुर्गम है. जिले के दूरस्थ इलाकों में रहने वाली आदिवासी आबादी तक स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाना हमेशा चुनौतीपूर्ण रहा है. विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (पीवीटीजी) तक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बढ़ाना आसान नहीं है. जया रेशमा खाखा ने पाट जैसे दुर्गम क्षेत्रों में रहने वाले लोगों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने के लिए लगातार प्रयास किया. उनका जोर इस बात पर रहा कि स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ केवल शहर और प्रखंड मुख्यालयों तक सीमित न रहे, बल्कि गांवों और दूरस्थ बस्तियों में रहने वाले लोगों को भी समय पर जांच, उपचार और स्वास्थ्य संबंधी जानकारी मिल सके.

मिर्गी के 1296 मरीजों की हुई पहचान

स्वास्थ्य क्षेत्र में उनके प्रयासों का एक उल्लेखनीय उदाहरण मिर्गी से जुड़े मरीजों की पहचान और उपचार के लिए चलाया गया विशेष अभियान है. नई दिल्ली की वरिष्ठ न्यूरोलॉजिस्ट डॉ ममता भूषण के सहयोग से जिले के 12 प्रखंडों में मिर्गी की जांच, उपचार और स्वास्थ्य शिविर आयोजित किये गए. अभियान के दौरान 1,296 मरीजों की पहचान हुई. इसके बाद मरीजों को चिकित्सकीय परामर्श और उपचार उपलब्ध कराने की दिशा में काम किया गया. ग्रामीण क्षेत्रों में मिर्गी को लेकर जागरूकता की कमी और सामाजिक भ्रांतियां भी बड़ी चुनौती हैं. ऐसे में जांच और उपचार के साथ लोगों को बीमारी के प्रति जागरूक करना भी अभियान का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा.

आठ लाख लोगों की हुई सिकल सेल जांच

आदिवासी समाज के बीच सिकल सेल एनीमिया भी गंभीर स्वास्थ्य चुनौती है. इसकी समय पर पहचान और उचित परामर्श बेहद जरूरी है. जया रेशमा खाखा के प्रयासों से जिले में सिकल सेल एनीमिया की जांच को बड़े स्तर पर आगे बढ़ाया गया. स्वास्थ्य विभाग की ओर से करीब आठ लाख लोगों की स्क्रीनिंग कराना इस दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जाती है. इतनी बड़ी आबादी तक जांच पहुंचाने के लिए स्वास्थ्य कर्मियों, सामुदायिक स्तर पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं और स्वास्थ्य इकाइयों के बीच बेहतर समन्वय जरूरी था. इस व्यापक अभियान से संभावित मरीजों की पहचान, उन्हें आगे की जांच और चिकित्सकीय सलाह से जोड़ने तथा लोगों में बीमारी के प्रति जागरूकता बढ़ाने में मदद मिली.

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योजनाओं को धरातल तक पहुंचाने में सक्रिय भूमिका

जिला कार्यक्रम प्रबंधक के रूप में जया रेशमा खाखा की जिम्मेदारी केवल कार्यालय तक सीमित नहीं रही. स्वास्थ्य योजनाओं के क्रियान्वयन, विभिन्न कार्यक्रमों की निगरानी, स्वास्थ्य कर्मियों के साथ समन्वय और जरूरतमंद लोगों तक सेवाएं पहुंचाने में उनकी सक्रिय भूमिका रही है. गुमला जैसे आदिवासी बहुल जिले में स्वास्थ्य योजनाओं को स्थानीय जरूरतों के अनुरूप लागू करना बेहद जरूरी है. सामाजिक और भौगोलिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए स्वास्थ्य कार्यक्रमों को गांवों और दूरस्थ बस्तियों तक पहुंचाना भी बड़ी चुनौती है. जया ने इसी दिशा में लगातार काम किया.

संघर्ष से सेवा तक का सफर

जया रेशमा खाखा की कहानी व्यक्तिगत संघर्ष और सामाजिक सेवा का उदाहरण है. पति के निधन के बाद दो बेटियों की जिम्मेदारी संभालने के साथ उन्होंने अपने पेशेवर दायित्वों को भी पूरी प्रतिबद्धता से निभाया. उन्होंने साबित किया कि विपरीत परिस्थितियां किसी व्यक्ति की राह को कठिन जरूर बना सकती हैं, लेकिन मजबूत इच्छाशक्ति और सेवा का संकल्प हो तो उन्हीं परिस्थितियों को प्रेरणा में बदला जा सकता है.

स्वास्थ्य सेवा के असली चेहरे

स्वास्थ्य विभाग की योजनाओं की सफलता केवल आंकड़ों से नहीं, बल्कि उन लोगों के जीवन में आये बदलाव से मापी जाती है, जिन्हें इन योजनाओं का लाभ मिलता है. किसी दूरस्थ गांव में मरीज की समय पर पहचान, बीमारी का उपचार, परिवार को सही स्वास्थ्य जानकारी मिलना या गंभीर बीमारी की समय पर जांच, स्वास्थ्य सेवा की वास्तविक उपलब्धियां हैं. जया रेशमा खाखा जैसे समर्पित स्वास्थ्यकर्मियों का योगदान इन्हीं प्रयासों में दिखाई देता है. उन्होंने कठिन परिस्थितियों में काम करते हुए यह संदेश दिया है कि स्वास्थ्य सेवा सिर्फ नौकरी नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी भी है. व्यक्तिगत जीवन के संघर्ष से लेकर हजारों लोगों के स्वास्थ्य की चिंता तक उनका सफर बताता है कि सेवा और समर्पण से न केवल एक व्यक्ति अपना जीवन बदल सकता है, बल्कि पूरे समाज में उम्मीद की नई रोशनी भी जगा सकता है.


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लेखक के बारे में

By दुर्जय पासवान

दुर्जय पासवान ने वर्ष 2001 से पत्रकारिता की शुरुआत की. दैनिक जागरण में दो साल काम करने के बाद 2003 में वे प्रभात खबर से जुड़े. इसके साथ ही नयी दुनिया अखबार, प्रहार मैगजीन में भी अपनी सेवा दी. इसके बाद 2010 में वे दैनिक भास्कर गुमला का ब्यूरो इंचार्ज के रूप में काम शुरू किये. भास्कर में पांच साल सेवा देने के बाद दोबारा 2014 में प्रभात खबर में ब्यूरो इंचार्ज के रूप में वापसी की. तब से अबतक प्रभात खबर से जुड़े हुए हैं. उन्होंने नक्सलियों से जुड़ी खबरें, नक्सली घटनाएं, ग्राउंड रिपोर्ट, प्राचीन और ऐतिहासिक धरोहरों की खोज से संबंधित खबरों पर अच्छा काम किया. इन्हीं खबरों ने उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में पहचान दी. दुर्जय पासवान बहुत लगन से अपना सभी काम का पूरा करते हैं.

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