अंग्रेजों से लड़ने के लिए गढ़वाल से गुमला आ गए थे गंगाजी महाराज

Ganga Ji Maharaj Garhwal To Gumla: अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति करने वाले कई स्वतंत्रता सेनानियों ने अपना राज्य छोड़कर दूसरे राज्य में काम करना शुरू कर दिया था. ऐसे ही एक स्वतंत्रता सेनानी थे गंगाजी महाराज. वह गढ़वाल से गुमला में आकर रहने लगे. आज भी उनकी बेटी अपने बच्चों के साथ यहीं रहतीं हैं.

Ganga Ji Maharaj: अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ पूरे देश के लोग आंदोलन कर रहे थे. कुछ क्रांतिकारी अंग्रेजों से बचने के लिए अपना घर छोड़कर अन्य राज्यों में जाकर आंदोलन करने लगे. ऐसे ही एक आंदोलनकारी थे गंगाजी महाराज. उत्तर प्रदेश के गढ़वाल (अब उत्तराखंड में) के रहने वाले गंगाज महाराज भी ऐसे ही क्रांतिकारी थे. अंग्रेजों से बचने के लिए वह गढ़वाल से गुमला आ गए. यहीं रहकर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष किया. कई बार जेल गए. अंग्रेजों की लाठियां भी खाईं. आज उनका परिवार गुमनामी की जिंदगी जा रहा है. हालांकि, गुमला प्रखंड कार्यालय परिसर में जो अशोक स्तंभ बना हुआ है, उस पर जिले के जिन तीन स्वतंत्रता सेनानियों के नाम दर्ज हैं. उनमें एक गंगाजी महाराज का भी नाम है. स्वतंत्रता सेनानी गंगाजी महाराज ने देश की आजादी के लिए आंदोलन किया. जेल गये और अंग्रेजों की लाठियां भी खायी. आज उनका परिवार गुमनामी का जीवन जी रहा है.

गुमला में रहतीं हैं गंगाजी महाराज की बेटी सीता देवी

उनकी बेटी सीता देवी गुमला में रहतीं हैं. वह कहती हैं कि उनके पिता गंगाजी महाराज गढ़वाल के रहने वाले थे. वह स्वतंत्रता सेनानी थे. अपने कुछ साथियों के साथ उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ आवाज बुलंद की थी. इसके बाद अंग्रेज उन्हें पकड़ने के लिए खोजने लगे. अंग्रेजों से बचने के लिए आजादी से 2 साल पहले वर्ष 1945 में वह गढ़वाल से गुमला आ गये. उस समय गुमला जंगली इलाका था. बहुत कम घर थे.

गुमला के कांसीर गांव में बस गये थे गंगाजी महाराज

गंगाजी महाराज गुमला के रायडीह प्रखंड स्थित कांसीर गांव में बस गये. वह कांसीर गांव के जंगलों के बीच छिपकर रहने लगे और अंग्रेजों के खिलाफ काम करने लगे. अंग्रेज गुमला तक पहुंचे थे, लेकिन गंगाजी महाराज को पकड़ नहीं पाये. अभी जो काली मंदिर के समीप से गुजरने वाली नदी पर पुल है, उस समय नहीं था. नदी पार करके लोग आते-जाते थे.

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35 किलोमीटर पैदल चलकर हर दिन गुमला आते थे गंगाजी

गंगा जी महाराज अपने कुछ साथियों के साथ कांसीर से गुमला तक 35 किलोमीटर पैदल चलकर हर रोज आते थे और नदी के किनारे पूजा-पाठ करते थे. यहां अंग्रेजों के खिलाफ बैठक होती थी और आंदोलन की रणनीति बनती थी. गंगाजी महाराज नदी के किनारे पूजा-पाठ करने लगे. बाद में इसी स्थल पर काली मंदिर बना, जो आज सिद्ध पीठ के रूप में जाना जाता है.

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काली मंदिर के बगल में है गंगाजी महाराज का समाधि स्थल

सीता देवी गंगा जी महाराज की इकलौती बेटी हैं. वह काली मंदिर की मुख्य पुजारिन हैं. सीता देवी के बच्चे भी हैं. परिवार के अनुसार, जब तक गंगाजी महाराज जीवित थे, उन्हें पेंशन मिलती रही. आजादी की लड़ाई में अहम योगदान के लिए उनके परिवार को ताम्रपत्र मिला. गंगाजी महाराज का निधन 4 अक्तूबर 1985 को हो गया. उनका समाधि स्थल गुमला शहर के जशपुर रोड स्थित काली मंदिर के बगल में है. उनके निधन के बाद उनके परिवार की आय का स्रोत पेंशन भी बंद हो गई.

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By Mithilesh Jha

मिथिलेश झा PrabhatKhabar.com में पश्चिम बंगाल राज्य प्रमुख (State Head) के रूप में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार हैं. उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 32 वर्षों से अधिक का व्यापक अनुभव है. उनकी रिपोर्टिंग राजनीति, सामाजिक मुद्दों, जलवायु परिवर्तन, नवीकरणीय ऊर्जा, कृषि और अन्य समसामयिक विषयों पर केंद्रित रही है, जिससे वे क्षेत्रीय पत्रकारिता में एक विश्वसनीय और प्रामाणिक पत्रकार के रूप में स्थापित हुए हैं. अनुभव : पश्चिम बंगाल, झारखंड और बिहार में 3 दशक से अधिक काम करने का अनुभव है. वर्तमान भूमिका : प्रभात खबर डिजिटल (prabhatkhabar.com) में पश्चिम बंगाल के स्टेट हेड की भूमिका में हैं. वे डिजिटल न्यूज कवर करते हैं. तथ्यात्मक और जनहित से जुड़ी पत्रकारिता को प्राथमिकता देते हैं. वर्तमान में बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 पर पूरी तरह से फोकस्ड हैं. भौगोलिक विशेषज्ञता : उनकी रिपोर्टिंग का मुख्य फोकस पश्चिम बंगाल रहा है, साथ ही उन्होंने झारखंड और छत्तीसगढ़ की भी लंबे समय तक ग्राउंड-लेवल रिपोर्टिंग की है, जो उनकी क्षेत्रीय समझ और अनुभव को दर्शाता है. मुख्य विशेषज्ञता (Core Beats) : उनकी पत्रकारिता निम्नलिखित महत्वपूर्ण और संवेदनशील क्षेत्रों में गहरी विशेषज्ञता को दर्शाती है :- राज्य राजनीति और शासन : झारखंड और पश्चिम बंगाल की राज्य की राजनीति, सरकारी नीतियों, प्रशासनिक निर्णयों और राजनीतिक घटनाक्रमों पर निरंतर और विश्लेषणात्मक कवरेज. सामाजिक मुद्दे : आम जनता से जुड़े सामाजिक मुद्दों, जनकल्याण और जमीनी समस्याओं पर केंद्रित रिपोर्टिंग. जलवायु परिवर्तन और नवीकरणीय ऊर्जा : पर्यावरणीय चुनौतियों, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और रिन्यूएबल एनर्जी पहलों पर डेटा आधारित और फील्ड रिपोर्टिंग. डाटा स्टोरीज और ग्राउंड रिपोर्टिंग : डेटा आधारित खबरें और जमीनी रिपोर्टिंग उनकी पत्रकारिता की पहचान रही है. विश्वसनीयता का आधार (Credibility Signal) : तीन दशकों से अधिक की निरंतर रिपोर्टिंग, विशेष और दीर्घकालिक कवरेज का अनुभव तथा तथ्यपरक पत्रकारिता के प्रति प्रतिबद्धता ने मिथिलेश झा को पश्चिम बंगाल और पूर्वी भारत के लिए एक भरोसेमंद और प्रामाणिक पत्रकार के रूप में स्थापित किया है.

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