गढ़सारू पहाड़ की गुफा में विराजमान हैं प्राचीन शिवलिंग, सावन में उमड़ रही श्रद्धालुओं की भीड़

गुमला के गढ़सारू पहाड़ की गुफा में स्थित प्राचीन शिवलिंग सावन में श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र बना है. जानिए इस धार्मिक स्थल की खास विशेषताएं.

जगरनाथ पासवान की रिपोर्ट

गुमला शहर से महज तीन किमी की दूरी पर स्थित गढ़सारू पहाड़ की गुफा में प्राचीन शिवलिंग श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है. यहां से जुड़ी कई प्राचीन मान्यताओं के कारण भक्तों का विश्वास है कि सच्चे मन से मांगी गयी मुराद भगवान शिव पूरी करते हैं. सावन माह में बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचकर पूजा-अर्चना और जलाभिषेक करते हैं.

गढ़सारू पहाड़ तक पहुंचने के लिए पक्की सड़क बनी हुई है. हालांकि, पहाड़ पर स्थित शिवलिंग की गुफा तक जाने के लिए करीब आधा किमी पहाड़ी कच्चे रास्ते से गुजरना पड़ता है. इसके बावजूद श्रद्धालु आसानी से यहां पहुंच जाते हैं. मान्यता है कि सैकड़ों वर्ष पहले इस गुफा में स्वयं शिवलिंग प्रकट हुआ था. इसके बाद से यहां पूजा-अर्चना की परंपरा चली आ रही है.

पहाड़, जंगल और गुफा में स्थित होने के कारण लंबे समय तक यह शिवलिंग लोगों की नजरों से दूर रहा और कुछ स्थानीय लोग ही यहां पूजा करते थे. धीरे-धीरे इसकी जानकारी फैलने के बाद अब हर साल सावन में यहां भक्तों की संख्या बढ़ रही है. इस वर्ष भारी बारिश के बावजूद गढ़सारू पहाड़ पर श्रद्धालुओं की भीड़ देखने को मिल रही है.

गुफा के अंदर स्थित शिवलिंग पर जलाभिषेक करने में होने वाली परेशानी को देखते हुए सुरेश फोगला द्वारा गुफा के बाहर एक बड़े शिवलिंग का निर्माण कराया गया है, ताकि श्रद्धालु आसानी से पूजा कर सकें.

शिवलिंग के समीप दिखता है पहाड़ी पर्यटन स्थल जैसा नजारा

गढ़सारू पहाड़ पर पहुंचने के बाद आसपास का दृश्य किसी हिल स्टेशन जैसा नजर आता है. पहाड़ की ऊंचाई से गुमला शहर का सुंदर दृश्य दिखायी देता है. रात के समय शहर की जगमगाती रोशनी पहाड़ से बेहद आकर्षक दिखती है.

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सालभर बहता है पहाड़ का झरना

गढ़सारू पहाड़ की एक खासियत यहां मौजूद प्राकृतिक झरना भी है. इस झरने से सालभर पानी गिरता रहता है, जो पहाड़ी रास्ते से बहते हुए करीब आधा किमी दूर स्थित डाड़ी कुआं में पहुंचता है. यही कारण है कि डाड़ी कुआं का पानी कभी नहीं सूखता. यदि झरने को विकसित किया जाये, तो यह क्षेत्र एक आकर्षक पर्यटन स्थल बन सकता है.

पहाड़ पर बंदरों और मोरों का बसेरा

गढ़सारू पहाड़ का जंगल वन्यजीवों के लिए भी जाना जाता है. यहां बड़ी संख्या में बंदर रहते हैं, जबकि अक्सर मोर भी दिखायी देते हैं. स्थानीय लोगों के अनुसार, भीड़ बढ़ने पर मोर जंगल की ओर चले जाते हैं, जबकि बंदर गुफा के आसपास ही दिखायी देते रहते हैं.

पर्यटन विभाग से विकास की मांग

स्थानीय लोगों ने गढ़सारू पहाड़ को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की मांग की है. सुरेश फोगला ने कहा कि प्रशासन ध्यान दे, तो यह गुमला शहर का प्रमुख धार्मिक और पर्यटन स्थल बन सकता है. शहर के बीच पहाड़ की गुफा में स्थित शिवलिंग इसकी खास पहचान है, जिसे रांची के पहाड़ी मंदिर की तर्ज पर विकसित किया जा सकता है.

शिवलिंग गुफा के पास हैं कई बेल के पेड़

गढ़सारू पहाड़ की एक और विशेषता यह है कि शिवलिंग गुफा के आसपास आधा दर्जन से अधिक बेल के पेड़ हैं. इससे श्रद्धालुओं को भगवान शिव को बेलपत्र अर्पित करने में सुविधा होती है. प्राकृतिक वातावरण और धार्मिक महत्व के कारण यह स्थल श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बनता जा रहा है.

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लेखक के बारे में

By दुर्जय पासवान

दुर्जय पासवान ने वर्ष 2001 से पत्रकारिता की शुरुआत की. दैनिक जागरण में दो साल काम करने के बाद 2003 में वे प्रभात खबर से जुड़े. इसके साथ ही नयी दुनिया अखबार, प्रहार मैगजीन में भी अपनी सेवा दी. इसके बाद 2010 में वे दैनिक भास्कर गुमला का ब्यूरो इंचार्ज के रूप में काम शुरू किये. भास्कर में पांच साल सेवा देने के बाद दोबारा 2014 में प्रभात खबर में ब्यूरो इंचार्ज के रूप में वापसी की. तब से अबतक प्रभात खबर से जुड़े हुए हैं. उन्होंने नक्सलियों से जुड़ी खबरें, नक्सली घटनाएं, ग्राउंड रिपोर्ट, प्राचीन और ऐतिहासिक धरोहरों की खोज से संबंधित खबरों पर अच्छा काम किया. इन्हीं खबरों ने उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में पहचान दी. दुर्जय पासवान बहुत लगन से अपना सभी काम का पूरा करते हैं.

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