प्रतिनिधि, ठाकुरगंगटी.गोड्डा जिले के अंतिम छोर पर बसे ठाकुरगंगटी प्रखंड में सरकारी व्यवस्था की बदहाली का एक ऐसा मामला सामने आया है, जो व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है. यहां बीडीओ सह सीओ के पास सरकारी कामकाज के लिए अपना सरकारी वाहन तक उपलब्ध नहीं है. पिछले करीब नौ वर्षों से अधिकारी किराये की निजी गाड़ी के सहारे प्रखंड से लेकर जिला मुख्यालय तक का कामकाज निबटा रहे हैं.
जानकारी के अनुसार, वर्ष 2016 से ही प्रखंड के अधिकारियों को सरकारी कार्यों, क्षेत्र भ्रमण और जिला मुख्यालय आने-जाने के लिए निजी वाहन का सहारा लेना पड़ रहा है. इसके बदले सरकार की ओर से हर महीने किराये के रूप में लाखों रुपये खर्च किए जा रहे हैं.
सरकारी वाहन पड़ा-पड़ा हो गया कबाड़
एक ओर जहां सरकारी कामकाज के लिए निजी वाहन का इस्तेमाल किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर प्रखंड का सरकारी वाहन वर्षों से खराब पड़ा है. वाहन की मरम्मत कराने के बजाय उसे प्रखंड मुख्यालय परिसर में झाड़ियों के बीच छोड़ दिया गया है. लंबे समय से खुले में पड़े रहने के कारण वाहन की स्थिति लगातार खराब होती जा रही है और वह अब कबाड़ में तब्दील होता नजर आ रहा है.
निजी वाहन पर खर्च, सरकारी गाड़ी की अनदेखी
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब प्रखंड के पास अपना सरकारी वाहन मौजूद है, तो उसकी मरम्मत कराकर उसका इस्तेमाल क्यों नहीं किया जा रहा है. वर्षों से खराब पड़े वाहन की सुध नहीं लिए जाने के कारण सरकारी राशि से निजी वाहन का किराया चुकाना पड़ रहा है. ऐसे में एक ओर सरकारी संपत्ति बर्बाद हो रही है, तो दूसरी ओर सरकारी खजाने पर अतिरिक्त बोझ बढ़ रहा है.
दूरदराज के क्षेत्र में वाहन की जरूरत अधिक
ठाकुरगंगटी प्रखंड जिले के अंतिम छोर पर स्थित है. प्रखंड के कई इलाकों में अधिकारियों को नियमित रूप से क्षेत्र भ्रमण करना पड़ता है. ऐसे में सरकारी वाहन की उपलब्धता प्रशासनिक कार्यों के लिए बेहद जरूरी मानी जाती है. इसके बावजूद वर्षों से सरकारी वाहन के खराब पड़े रहने और उसकी मरम्मत नहीं होने से अधिकारियों को निजी वाहन पर निर्भर रहना पड़ रहा है.
व्यवस्था पर उठ रहे सवाल
सरकारी वाहन के वर्षों से झाड़ियों में पड़े रहने और अधिकारियों के निजी वाहन से सरकारी कामकाज करने की व्यवस्था को लेकर अब सवाल उठने लगे हैं. आखिर किस स्तर पर सरकारी वाहन की मरम्मत की प्रक्रिया अटकी हुई है और नौ वर्षों में इसकी सुध क्यों नहीं ली गयी, यह जांच का विषय है. यदि समय रहते वाहन की मरम्मत करा दी जाती, तो संभवत: सरकारी खजाने पर हर महीने पड़ने वाले अतिरिक्त आर्थिक बोझ को भी कम किया जा सकता था.
