पोड़ैयाहाट. प्रखंड परिसर में आदिवासी समाज के द्वारा धूमधाम बाहा पर्व मनाया गया. दर्जनों गांव के आदिवासी महिला एवं पुरुष आयोजन में शामिल हुए. इस अवसर पर पर्व मांझी हाड़ाम अनिल टुडू, जोग मंझी, नायकी सुरेंद्र मुर्मू, गोड़ैत अशोक किस्कू, पवरगणैत जयराम मुर्मू सभी ग्रामीणों के साथ पूजा अर्चना करने जाहेरथान पहुंचे, जहां नायकी ने परंपरागत तरीके से पूजा की. मुर्गे की बलि दी गयी. इसके बाद महिलाएं एवं पुरुष को सखुआ का पुष्प दिया गया. वहां से बाहा गीतों एवं मांदर की थाप पर नाचते गाते हुए सभी लोग मांझी थान पहुंचे. मरांग बुरु, मांझी गोगो, मांझी बाबा को पुष्प अर्पित किया गया. बताया गया कि बाहा पर्व तीन दिवसीय है. प्रखंड विकास पदाधिकारी फुलेश्वर मुर्मू ने भी शिरकत की. बाहा पर्व के महत्व पर प्रकाश डाला गया. बीडीओ ने कहा कि यह तीन दिवसीय पर्व हैं. पहले दिन उम नाड़का महा है, उसी दिन घर का साफ-सफाई हागी. दूसरे दिन साड़ीम दाप (छावनी ), तीसरे दिन विधि विधान के साथ पूजा कर एक-दूसरे पर जल डाला जायेगा. पौराणिक कथाओं के अनुसार जब मानव जाति के वंशज बहुतायत संख्या में हो गये तो इन लोगों ने सामाजिक नियमों को तोड़ना शुरू कर दिया. जैसे मानव जाति में संबंध तार-तार हो गये. भाई-बहन मां बेटा का रिश्ता निभाना छोड़ दिया. इन सारी चीजों के सृष्टि के रचयिता मंराग ठाकुर के साथ-साथ मरांग बुरु, जाहेर आयु, इन सारी चीजों पर देख रहे थे. फिर क्या था सृष्टि के सृजनकर्ता संघार करने का निर्णय लिया. अग्नि वर्षा करायी गयी. इसमें अधिकतर दुराचारी लोग जलकर भस्म हों गये, कुछ मूर्छित भी हो गये. उसमें दो महामानव जीवित रहे. फिर सृष्टि के सृजनकर्ता निर्णय लिया कि पुनर्जीवित व्यक्तियों को मरांग बुरु माध्यम से पुनर्जीवित किया गया और दोनों जीवित महामानव के माध्यम से पुनर्जीवित व्यक्ति के द्वारा मरांग बुरु के पास पाप को स्वीकार की गयी. और भरोसा दिलाया की अज्ञानता बस हमसे सामाजिक कुरीतियां हुई है. अब कभी ऐसा भूल नहीं होगा. तभी से बाहा पर्व मनाया जाने लगा. मौके पर सनत टुडू, राजेश हांसदा, देवेंद्र सोरेन, विजय मुर्मू, जेम्स मुर्मू, अनिल टुडू, महेंद्र, महेश सोरेन, रामू मुर्मू, सुरजदेव मुर्मू, सुरेंद्र मुर्मू, मुकेश टुडू, संजय सोरेन आदि मौजूद थे.
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