गोड्डा : गोड्डा एसडीओ बैद्यनाथ उरांव द्वारा रचित कविता संग्रह ‘अरण्या’ उनकी कई वर्षों की सतत मेहनत का परिणाम है. राज्य के विभिन्न जिलों में सेवा देने के दौरान उनका निरंतर जुड़ाव समाज के ऐसे वर्ग से रहा, जो आज भी विकास के हाशिए पर हैं. कवि हृदय उरांव ने अपनी रचनाओं के जरिए गांव, जंगल, पर्वत और कंदराओं से होते हुए शहर तक की जीवन यात्रा को बेहद सात्विक और सरल ढंग से उकेरा है. उनकी कविताओं में राष्ट्रप्रेम के साथ-साथ व्यवस्था पर सीधा और सटीक प्रहार देखने को मिलता है.
जल, जंगल, जमीन और सांस्कृतिक विरासत की झलक
‘अरण्या’ में संकलित 51 कविताएं सांस्कृतिक स्वरूप को सहेजने का एक सार्थक प्रयास हैं. इसमें जल, जंगल और जमीन के महत्व को केंद्र में रखा गया है, जिसके बिना जीवन की परिकल्पना अधूरी है. इसके अलावा, आदिवासी समाज के गौरवशाली इतिहास और सिदो-कान्हू, बिरसा मुंडा तथा जतरा उरांव जैसे महान स्वतंत्रता सेनानियों को समर्पित कई कविताएं इस संग्रह की शोभा बढ़ा रही हैं.
सामाजिक बुराइयों और युवा त्रासदी पर तीखा प्रहार
अपनी रचनाओं में श्री उरांव ने केवल प्राकृतिक सौंदर्य ही नहीं, बल्कि ज्वलंत सामाजिक मुद्दों को भी प्रमुखता से उठाया है. युवा वर्ग में बढ़ती नशाखोरी की त्रासदी, रक्तदान का महत्व और सड़क सुरक्षा जैसे विषयों पर उनकी कलम ने बेहद संजीदगी से लिखा है. प्रशासनिक पद पर रहते हुए भी उन्होंने अपनी सोच और लेखनी को पूरी तरह स्वतंत्र रखा है. यही वजह है कि राजनीतिक आलोचनाओं को भी उन्होंने एक मर्यादा के भीतर रखकर कविता का रूप दिया है.
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पत्रकारिता की पृष्ठभूमि और गोड्डा से गहरा लगाव
अपनी इस साहित्यिक यात्रा पर बात करते हुए बैद्यनाथ उरांव ने बताया कि उनके प्रशासनिक सेवा में चयन के दौरान पत्रकारिता की डिग्री बेहद मददगार साबित हुई. गोड्डा में इस पुस्तक के प्रकाशन के बाद उन्होंने कहा कि गोड्डा में उनके लेखन को नया निखार मिला है और यह शहर हमेशा उनके मन-मस्तिष्क में बसा रहेगा. उन्होंने गोड्डा के प्रति अपना आभार व्यक्त करते हुए कहा कि वे इस धरती के सदैव ऋणी रहेंगे.
‘अरण्या’ के मुख्य बिंदु
- 51 कविताओं का अनूठा संग्रह
- जल, जंगल और जमीन की सुरक्षा पर विशेष जोर
- सिदो-कान्हू, बिरसा मुंडा और जतरा उरांव को समर्पित रचनाएं
- नशामुक्ति, रक्तदान और सड़क सुरक्षा जैसे सामाजिक संदेश
- राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था पर संतुलित कटाक्ष
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आगामी पुस्तक की तैयारी में जुटे कवि
‘अरण्या’ की सफलता के बाद श्री उरांव अपनी दूसरी पुस्तक की तैयारी में जुट गए हैं. उनका मानना है कि जिस प्रकार सुर, लय और ताल से ही बेहतरीन संगीत बनता है, ठीक उसी तरह कविता की रचना में भी इन तत्वों का होना आवश्यक है. पाठकों और साहित्यकारों को जल्द ही उनकी नई सोच वाली कविताओं की किताब पढ़ने को मिलेगी.
