आदिवासी विकास व ग्राम विकास समिति के गठन से बढ़ी मुखिया जी की बेचैनी

गोड्डा : एक ओर पंचायतों को और भी सशक्त बनाये जाने की कवायद की जा रही है वहीं दूसरी ओर हाल के दिनाें में पंचायतों में आदिवासी विकास समिति व ग्राम विकास समिति के गठन से मुखिया जी की बेचैनी बढ़ गयी है. मुखिया जी इन संगठनों को ग्राम स्तर पर गठन होने से चिंतित […]

गोड्डा : एक ओर पंचायतों को और भी सशक्त बनाये जाने की कवायद की जा रही है वहीं दूसरी ओर हाल के दिनाें में पंचायतों में आदिवासी विकास समिति व ग्राम विकास समिति के गठन से मुखिया जी की बेचैनी बढ़ गयी है. मुखिया जी इन संगठनों को ग्राम स्तर पर गठन होने से चिंतित ही नहीं परेशान भी हैं. मुखिया ने इन संगठनों के गठन का मुखर आवाज में विरोध भी किया है. जब से जिले में पंचायतों में आदिवासी विकास समिति व ग्राम विकास समिति के गठन की कवायद शुरू हुई है तब से मुखिया जी दूरी बनाकर ही चल रहे हैं.

पंचायत प्रतिनिधियों का साफ तौर पर मानना है कि इससे पंचायती राज कमजोर होगा. वे सीधे राज्य सरकार को इसके लिए दोषी मान रहे हैं. मुखिया जी का कहना है कि सरकार पंचायतों में समानांतर पंचायती राज संस्था बनाने में लगी है. इससे पंचायती राज व्यवस्था ध्वस्त होगी. मुखिया का अधिकार छिनेगा साथ ही पंचायती समिति व वार्ड सदस्य भी अधिकारों से वंचित हो जायेंगे.

100 परिवार वाले आबादी पर ही बनना है ग्राम विकास समिति : समिति के गठन का सीधा प्रारूप है. हरेक गांव जहां की आबादी 100 परिवार वाली है वहां भी एक समिति का गठन होना है. जहां आदिवासी परिवारों की संख्या है वहां आदिवासी ग्राम विकास समिति व जहां आदिवासी परिवार नहीं हैं, वहां ग्राम विकास समिति का गठन होना है. इसमें महिलाओं की भी भागीदारी सुनिश्चित की गयी है. इसके लिए नौ सदस्यीय व 11 सदस्यीय समिति बनायी जानी है.
पांच लाख रुपये तक की योजनाओं का क्रियान्वयन करेगी समिति : दिये गये प्रावधान के अनुरूप दो साल ही समिति का कार्यकाल होगा. साथ ही इस समिति को अपने क्षेत्रों में पांच लाख रुपये तक की योजना का चयन किये जाने के बाद कार्यान्वित किये जाने की शक्ति होगी. योजना पास प्रखंड स्तर से होगी. मंजूरी प्रखंड स्तर पर ही होगी. इसके बाद योजना को समिति क्रियान्वित करेगी.
कहां है परेशानी
परेशानी मुख्य रूप से योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर है. अब जब गांव में 5-5 लाख की योजना का संचालन व क्रियान्वयन होगा तब मुखिया जी की बेचैनी बढ़नी स्वाभाविक ही है. मुखिया जी इस मामले में सीधे अपने वित्तीय अधिकार के हनन का मामला देख रहे हैं तथा गठन का खुले तौर पर विरोध भी कर रहे हैं.
कहीं कोई परेशानी नहीं है. पंचायत के प्रतिनिधियों को यह भ्रम है. यह एक प्रकार का लाभुक समिति है. यह पूर्व में भी बनता था. मुखिया लाभुक समिति बनाकर ही काम करते हैं. किसी के बहकावे में आने की जरूरत नहीं है.”
-फुलेश्वर मुर्मू, जिला पंचायती राज
पदाधिकारी, गोड्डा

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