Giridih News: गिरिडीह में डोभा पर खर्च हुए तीन अरब, लोगों को नहीं मिल रहा लाभ

Giridih News: महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम का उद्देश्य ग्रामीणों का विकास व आजीविका सुरक्षा, गांव के मजदूरों के लिए रोजगार सृजन (100 दिन काम की गारंटी) है. मनरेगा से मिट्टी मोरम सड़क, डोभा, तालाब समेत मिट्टी के कार्य होते हैं. इससे ग्रामीण क्षेत्रों के बुनियादी ढांचे के विकास में मदद मिलती है और ग्रामीण परिवार मजदूरी कर आर्थिक रूप से सशक्त होता हैं, लेकिन मनरेगा में हावी ठेकेदारी प्रथा, जेसीबी का प्रयोग, फर्जी डिमांड समेत अन्य मामले जॉब कार्डधारियों व लाभुकों को कम, वहीं पंचायत प्रतिनिधि, ठेकेदार व अधिकारी-कर्मचारी को ज्यादा लाभ पहुंचा रहा है.

By MAYANK TIWARI | June 18, 2025 12:38 AM

आलम यह है कि जिले में पिछले 10 वर्षों में मनरेगा से निर्मित डोभा की स्थिति बद से बदतर हो गयी है. मनरेगा से निर्मित डोभा पर समशुल अंसारी, कुमार गौरव व श्रवण कुमार की रिपोर्ट:

मनरेगा के तहत रोजगार मुहैया कराने के साथ जल संरक्षण का माध्यम है. वर्ष 2005 में नरेगा एक्ट को जमीन पर उतारा गया. नरेगा से पहली बार एक लाख की लागत से तालाब निर्माण का शुरुआत हुई थी इसके बाद नदी-नाले पर चेकडैम आदि बनने लगे. लेकिन वर्ष 2015-16 में राज्य में रघुवर दास की सरकार ने मनरेगा के तहत डोभा निर्माण को प्राथमिकता दी ताकि जल संरक्षण के साथ-साथ ग्रामीण मजदूरों को गांव-पंचायत में रोजगार मिल सके. लेकिन कालांतर में समय पर मजदूरी भुगतान नहीं होने, नित नये नये सिस्टम समेत अन्य पेंच के कारण मनरेगा में मजदूरों की दखल निरंतर कम होने लगी और ठेकेदारी प्रथा हावी होने लगी. गांव, पंचायत के गिने चुने लोग आम लोगों के नाम डोभा, तालाब स्वीकृत करवा कर लाभूक को चंद रूपये देकर स्वयं मालामाल होने लगे. यही वजह है कि अब मनरेगा मजदूरों की नहीं वरन ठेकेदारों की योजना बन कर रह गयी है.

एक ही स्थल पर डोभा-तालाब की लंबी फेहरिस्त

मनरेगा के तहत जिले में हजारों डोभा बने,करोड़ों खर्च हुए लेकिन इसका सीधा लाभ ठेकेदारों को मिला है. मनरेगा में हावी ठेकेदारी प्रथा के कारण कई गांवों में एक ही स्थान पर डोभा तालाब की लंबी फेहरिस्त नजर आती है. आलम यह है कि कतिपय गैर मजुरवा आम व खास समेत जंगल व पहाड़ियों के तटों पर योजनाओं की लाइन लगी है. कुछ ऐसा ही मामला फुलजोरी पंचायत अंतर्गत केबी सहाय हॉल्ट के पूरब दिशा स्थित पहाड़ी में साफ नजर आता है. यहां दर्जनाधिक डोभा व तालाब मनरेगा में लूट का प्रत्यक्ष उदाहरण है. कुछ ऐसी ही स्थिति फुलजोरी के पहरी डीह पहाड़ी एवं फुलझरिया पंचायत अंतर्गत अर्जुनबाद पुल के पास नजर आता है. स्थिति यह है कि जिओ टैग की मिलान की जाए तो यहां डोभा में ही तालाब एवं तालाब में ही डोभा मिल सकता है.

90 प्रतिशत योजनाओं में बोर्ड नहीं

वैसे तो जिले में मनरेगा से हजारों डोभा बने हैं लेकिन कार्यस्थल पर बोर्ड नजर नहीं आता है. एक आंकड़े के अनुसार जिले में 90 प्रतिशत डोभा में प्राकलन बोर्ड नहीं है. जिस कारण इससे जुड़े लोग एक ही डोभा को दो दो बार दिखा कर राशि की निकासी कर लेते हैं. सबसे बड़ी बात है कि इस खेल में ब्लॉक के पदाधिकारियों से लेकर पंचायत प्रतिनिधि, रोजगार सेवक व बिचौलिया लिप्त हैं. शिकायत के बाद जांच व कार्रवाई की लंबी प्रक्रिया के बीच संबंधित लोग येन-केन-प्रकारेन मामले को दबा देते हैं.

स्वीकृति के पूर्व हो जाती है जेसीबी से खुदाई,बाद में होता है जियो टैग व डिमांड

मनरेगा वर्तमान में एक्ट न होकर कमाई की योजना बन कर रह गयी है. स्थिति यह है कि इन दिनों मनरेगा में मजदूर कम मशीन से ज्यादा काम होता है. नाम न छापने के शर्त पर एक ठेकेदार ने बताया कि मनरेगा में अब स्वीकृति के पूर्व ही जेसीबी से डोभा-तालाब की खुदाई कर ली जाती है. इसके बाद मजदूर से ड्रेसिंग कराने के उपरांत जिओ टैग व डिमांड कराया जाता है. इसका प्रत्यक्ष उदाहरण बरमसिया वन पंचायत का गोंदली टांड गांव है. यहां रेलवे पुल के पास जेसीबी से खुदाई व मजदूर से ड्रेसिंग के बाद दो तालाब निर्माण की स्वीकृति का प्रयास हुआ था.हालांकि बीडीओ की इसकी भनक लगने के बाद बीपीओ व रोजगार सेवक को उक्त कार्य की स्वीकृति नहीं करने का निर्देश दे दिया गया.

कई डोभा धंसे तो कुछ हुए उपयोगी

पिछले 10 वर्षों में हजारों डोभा बने.जिसमें गिनती भर डोभा उपयोगी साबित हुए जबकि अनगिनत डोभा धंस गये और अनुपयोगी साबित हुए. गांडेय के घाटकुल पंचायत अंतर्गत लेदो में मो. माबिन की जमीन में निर्मित डोभा जीविकोपार्जन का साधन बन गया है. लाभुक ने बताया कि उक्त डोभा में बरसात के अलावा घर का पानी भी जाता है जिस कारण सालों भर पानी रहता है. इससे वे सिंचाई भी करते हैं और मत्स्य पालन भी. जिससे उन्हें आर्थिक लाभ भी मिल रहा है. इधर कई स्थानों पर डोभा धंस कर खेत बन चुका है. सीधे तौर पर कहा जाये तो जिले में 80 प्रतिशत डोभा सुखे पड़े हैं.

वर्ष 2016-17 में बना सबसे ज्यादा डोभा

पिछले 10 वर्षों की बात करें तो वर्ष 2015-16 में सबसे कम 45 डोभा का निर्माण हुआ जबकि वर्ष 2016-17 में 8861 डोभा का निर्माण हुआ. कए आंकड़े के अनुसार पिछले 10 वर्ष में जिले में 29 हजार 299 डोभा बने हैं. जिसमें 3 अरब, 4 करोड 72 लाख खर्च हुए हैं. हालांकि यह आंकड़ा एक पोर्टल का है. अन्य पोर्टल के योजनाओं का डेटा जोड़ा जाये तो आंकउ़े बढ़ भी सकते हैं.

वर्षवार आंकड़ा

वर्ष – योजना – राशि2015~16 – 45 – 11,15,028

2016~17 – 8861 – 37,43,70,186

2017~18 – 3997 – 22,59,37,020

2018~19 – 2091 – 20,23,39,527

2019~20 – 1086 – 10,18,64,895

2020~21 – 5486 – 57, 08, 92, 004

2021~22 – 1874 – 30, 46, 14, 929

2022~23 – 2629 – 53, 91, 48, 028

2023~24 – 2679 – 59, 39, 43, 525

2024~25 – 551 – 13, 30, 08, 463

कुल~29299 – 3,04, 72, 33, 605

खत्म हो रहा आदर्श डोभा का अस्तित्व, स्वरोजगार के लिए बनी थी 4.42 लाख की योजना

ग्रामीण क्षेत्र में रोजगार को बढ़ावा देने के लिए मनरेगा के तहत तालाब,डोभा, कुप,टीसीबी,मिट्टी मोरम सड़क, बिरसा मुंडा आम बागवानी समेत अनेकों योजनाओं को धरातल पर उतारा जा रहा है. कुछ योजना से मजदूरों को रोजगार तो कुछ से किसान स्वावलंबी हो रहे हैं. इन्हीं योजनाओं में एक आदर्श डोभा निर्माण भी है जिसकी अनदेखी के कारण इसका अस्तित्व खत्म हो रहा है.हम बात कर रहे हैं बुधुडीह पंचायत अंतर्गत सुजना में निर्मित आदर्श डोभा का. जानकारी के अनुसार वर्ष 2016-17 में प्रखंड के बुधुडीह पंचायत अंतर्गत सुजना निवासी महादेव टुडू के नाम आदर्श डोभा की स्वीकृति हुई थी. 4.42 लाख की लागत से कालांतर में डोभा के साथ मुर्गी व बत्तख शेड के साथ डोभा में मत्स्य पालन हेतु सीढ़ी भी बना. डोभा व शेड निर्माण के एवज में 4.38 लाख की निकासी भी हो गयी.लेकिन आदर्श डोभा के उद्देश्य की पूर्ति नहीं हो पायी. मेट कौशल पण्डित ने बताया कि बारिश में मिट्टी कटाव से डोभा का कुछ भाग भर गया और पानी कम होने व सीढ़ी टूट ने के कारण मत्स्य व बत्तख पालन पर विराम लग गया.इस बीच कतिपय लोगों ने शेड में लगे दरवाजा को उखाड़ कर चोरी कर ली जिस कारण मुर्गी पालन का भी सपना टूट गया.

बगोदर : कमाई का जरिया बन गया है डोभा निर्माण

बगोदर प्रखंड के मनरेगा के तहत किये डोभा निर्माण कार्य महज एक कमाई का जरिया बन कर रह गया है. प्रखंड के 22 पंचायत में ऐसे भी पंचायत हैं, जहाँ डोभा का निर्माण कार्य भी नहीं किया गया है. जिससे किसानों को इसका लाभ नहीं मिल पाया हैं. बीते पांच साल में जरमुन्ने पश्चिमी, जरमुन्ने पूर्वी, देवराडीह , में मनरेगा के तहत कार्य नहीं किया गया है. इसके अलावे कई पंचायत ऐसे भी हैं. जिनमें डोभा का कार्य हुई है. तो महज बरसात के दिनों पानी दिखता है. कई स्थानों पर लाखों की लागत से बना डोभा मैदान का रूप ले लिया है. इधर प्रखंड के मुंडरो, बीरनिया टांड और बेरका टोंगरी में वर्ष 2012-13 में निर्मित डोभा पूरी तरह से सुख चुका है. जिससे किसान लाभ से वंचित हैं. हालांकि 2023-24 में तीन लाख 75 हजार की लागत से अटका में निर्मित ज्योतिरमा राज सागर का डोभा बेहतर डोभा बन गया है. लाभूक डोभा में आजीविका के तौर पर मछली पालन हेतु कार्य कर रहा है.

देवरी: आजीविका का साधन बन गया है डोभा

प्रखंड के सैकडों डोभा बने हैं कहीं सुखे पड़े हैं तो कहीं धंस कर खेत बन चुके हैं. लेकिन देवरी के गादिदिघी पंचायत के कांटीदिघी गांव के टोला लिलैया में निर्मित डोभा लाभदायक साबित हो रहा है. जानकारी के मुताबिक मनरेगा योजना से वित्तीय वर्ष 2021 -22 में 60×60 डोभा का निर्माण किया गया है. डोभा निर्माण से अब तक नही सूखा है, उक्त डोभा में वर्ष भर पानी भरा रहता है। वर्तमान समय में उक्त डोभा में चार फीट गहरा पानी जमा हुआ है. किसान प्रदीप यादव, बाबूलाल यादव, सुनील यादव, दिनेश यादव, अजय यादव आदि ने बताया कि डोभा में जमा पानी खरीद फसल में धान व रबी फसल के सीजन में गेहूं की फसल की सिंचाई करने में सुविधा होती है. बताया कि सिंचाई के साथ साथ डोभा में मछली पालन भी कर रहे हैं.

गड़बड़ी की शिकायतें मिली तो होगी प्राथमिकी दर्ज : डीडीसी

डीडीसी स्मृता कुमारी ने कहा कि डोभा निर्माण में कुछ शिकायतें मिली हैं, इसमें जांच के बाद कार्रवाई भी की गयी है. कई लोगों से अब तक रिकवरी की जा चुकी है. इसके बाद भी यदि गड़बड़ी पर अंकुश नहीं लगा तो संबंधित लोगों के विरुद्ध प्राथमिकी भी दर्ज की जायेगी. बताया कि जैसे-जैसे शिकायतें मिलती है, जांच के बाद विधि सम्मत कार्रवाई की जाती है. स्मृता ने कहा कि मनरेगा की योजनाओं में किसी भी स्थिति में ठेकेदारी प्रथा या बिचौलियागिरी बर्दाश्त नहीं की जायेगी. कहा कि यदि इस तरह की कोई शिकायतें मिली तो संबंधित लोगों के विरुद्ध भी कार्रवाई की जायेगी. मनरेगा की योजना में जेसीबी का परिचालन भी गलत है. इस तरह के मामले कहीं पकड़ी गयी तो संबंधित लोगों से रिकवरी की जायेगी.

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