दो क्यूबिक मीटर क्षमता के प्लांट से आठ सदस्यीय परिवार की एलपीजी पर निर्भरता शून्य जितेंद्र सिंह गढ़वा
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ईरान और इजराइल के बीच बढ़ते तनाव का असर अब आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी पर भी दिखने लगा है. पेट्रोलियम उत्पादों की आपूर्ति प्रभावित होने से देश के कई हिस्सों में एलपीजी गैस की किल्लत बढ़ गयी है. लोग गैस सिलेंडर के लिए घंटों लाइन में खड़े रहते हैं, तब जाकर घर का चूल्हा जल पाता है. ऐसे समय में गढ़वा जिले से एक प्रेरक उदाहरण सामने आया है, जिसने दिखाया है कि ग्रामीण अपने संसाधनों से भी कैसे ऊर्जा संकट का समाधान कर सकते हैं. श्री वंशीधर नगर प्रखंड के पाल्हे कला गांव के किसान हृदय नाथ चौबे ने अपने घर में गोबर गैस प्लांट लगवाकर एलपीजी पर निर्भरता लगभग खत्म कर दी है. उन्होंने सिस्टेमा बायोटेक कंपनी की मदद से महज 10,500 रुपये में दो क्यूबिक मीटर क्षमता का प्लांट स्थापित किया. हृदय नाथ बताते हैं कि प्लांट लगने के एक महीने के भीतर ही गैस का उत्पादन शुरू हो गया था. शुरुआत में, खासकर सर्दियों में, गैस उत्पादन कम था और कभी-कभी एलपीजी सिलेंडर का सहारा लेना पड़ता था. लेकिन गर्मियों में उत्पादन बढ़ गया और अब उनके आठ सदस्यीय परिवार का सारा खाना गोबर गैस से तैयार हो रहा है. उन्होंने बताया कि पहले एक गैस सिलेंडर लगभग 20 से 25 दिन चलता था, जिसपर निर्भरता पर पूरी तरह से खत्म हो गयी है. हृदय नाथ का कहना है कि यह सिर्फ बचत नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर बनने की दिशा में बड़ा कदम है.
गोबर गैस प्लांट का मिल रहा दोहरा लाभगोबर गैस प्लांट सिर्फ खाना पकाने की गैस ही नहीं देता, बल्कि खेतों के लिए जैविक खाद भी उपलब्ध कराता है. प्लांट से निकलने वाली मीथेन गैस खाना बनाने में काम आती है और बचे हुए तरल को जैविक खाद के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है. यह खाद मिट्टी की उर्वरता बढ़ाता है और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करता है. खुले में गोबर रखकर निकलने वाली हानिकारक गैसों से भी पर्यावरण को नुकसान कम होता है. इस तरह यह पहल आर्थिक और पर्यावरणीय दोनों दृष्टियों से लाभकारी है.
सरल प्रक्रिया, बड़ा लाभदो क्यूबिक मीटर क्षमता वाले प्लांट में फ्लेक्सिबल डाइजेस्टर होता है. इसमें प्रतिदिन लगभग 40 किलोग्राम ताजा गोबर को 100 लीटर पानी में मिलाकर डाला जाता है. एक महीने के भीतर गैस बनने लगती है. यह प्लांट आठ सदस्यीय परिवार के लिए पर्याप्त गैस देता है और प्रतिदिन लगभग 140 लीटर तरल जैविक खाद भी मिलता है.
ग्रामीणों के लिए प्रेरणाआज जब लोग गैस की किल्लत और महंगाई से परेशान हैं, हृदय नाथ चौबे का प्रयास आत्मनिर्भरता की मिसाल बन गया है. यह दिखाता है कि ग्रामीण संसाधनों के बल पर बड़ी समस्याओं का समाधान संभव है. गढ़वा के अन्य किसानों के लिए यह संदेश है कि वे भी गोबर गैस जैसी वैकल्पिक ऊर्जा अपनाकर अपने जीवन को सरल, किफायती और पर्यावरण अनुकूल बना सकते हैं.
