तुलबुला में पूरी तरह से फेल है मनरेगा

तुलबुला से लौटकर विनोद पाठक गढ़वा : गढ़वा प्रखंड के तुलबुला गांव में मनरेगा से साल में 100 दिन मजदूरी देने की गारंटी कार्यक्रम पूरी तरह से विफल है. मनरेगा की स्थिति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ओबरा पंचायत में आनेवाले इस गांव में वर्ष 2010 से एक भी योजना […]

तुलबुला से लौटकर विनोद पाठक

गढ़वा : गढ़वा प्रखंड के तुलबुला गांव में मनरेगा से साल में 100 दिन मजदूरी देने की गारंटी कार्यक्रम पूरी तरह से विफल है. मनरेगा की स्थिति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ओबरा पंचायत में आनेवाले इस गांव में वर्ष 2010 से एक भी योजना स्वीकृत नहीं हो सकी है. इसके कारण आदिवासियों को जीविकोपाजर्न के लिए गांव से पलायन करना नियति बन चुकी है.

रोजगार के लिए तुलबुला के आदिवासी ग्रामीण दक्षिण भारत के राज्यों अथवा हरियाणा,पंजाब में जाकर मजदूरी करते हैं. गांव में सिर्फ बूढ़े, महिला और बच्चे रह गये हैं.

ग्रामीण बताते हैं कि 2010 से पहले की स्वीकृत पुराने बांध को मरम्मत करने एक योजना में ग्रामीणों को काम मिला था, लेकिन इस बांध का निर्माण अधूरा रह गया और मजदूरों का भुगतान भी नहीं हो सका. बाद में स्वयंसेवी संस्था ग्रीन ग्लोब के प्र यास से मजदूरों का भुगतान हुआ. वर्ष 2011 में ओबरा पंचायत के लिए मनरेगा से काम के लिए 900 आवेदन दिये गये थे, इसमें से 150 आवेदन तुलबुला गांव से दिये गये थे. इस आवेदन के आलोक में ओबरा पंचायत के लिए 80 लाख की योजना तत्कालीन उपायुक्त आरपी सिन्हा ने स्वीकृत की, लेकिन इसमें से तुलबुला के लिए एक भी योजना नहीं थी.

ग्रामीणों का नेतृत्व कर रहे जनमुक्ति आंदोलन के विंदेश्वर उरांव बताते हैं कि एक चार लाख की योजना का अभिलेख तैयार करवाने के लिए उन्होंने ब्याज पर राशि ली. इसे जिला में भेजा गया, लेकिन यह योजना जिला से स्वीकृत नहीं हुई. इस बीच यहां के मजदूरों ने भदुमा में बन रहे एक आहर में काम किया. लेकिन वहां भी उनकी पूरी मजदूरी नहीं मिली. स्थिति यह है कि इन दिनों मजदूरों को मजदूरी भुगतान के लिये प्रखंड कार्यालय का घेराव करना पड़ रहा है.

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By Prabhat Khabar Digital Desk

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