East Singhbhum News : सरस्वती पूजा 23 को, 80 मूर्तियों के ऑर्डर मिले

गालूडीह: मां सरस्वती की मूर्ति को अंतिम रूप देने में जुटे हैं मूर्तिकार

बदलते समय में फीकी पड़ती टुसू परंपरा, मूर्तियों की घटी मांग

संवाददाता, गालूडीह

टुसू पर्व झारखंड की परंपरा, संस्कृति और धरोहर से जुड़ा हुआ है. यह पर्व लोक आस्था, सामूहिक उल्लास और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक माना जाता है. हालांकि, आधुनिकता के चकाचौंध में परंपरा पीछे छूट रही है. टुसू गीतों और टुसू प्रतिमाओं की मांग पहले जैसी नहीं है. एक समय था जब मकर संक्रांति से करीब 15 दिन पहले ही गांव-गांव में टुसू गीतों की गूंज सुनायी देती थी और लोग पूरे उत्साह के साथ टुसू की प्रतिमाएं खरीदकर घर और अखाड़ों में स्थापित करते थे. लेकिन अब हालात पूरी तरह बदल चुके हैं. आज लोग अपनी संस्कृति और परंपरा का निर्वहन केवल लोक-लाज के लिए करते नजर आ रहे हैं. इसका प्रत्यक्ष प्रमाण गालूडीह के मूर्तिकारों से बातचीत में सामने आया है. टुसू प्रतिमाओं की घटती मांग के कारण इस वर्ष गालूडीह के मूर्तिकार विकास दलाई, कंगला दलाई, बंकेश दलाई और दुखीराम दलाई ने एक भी टुसू प्रतिमा का निर्माण नहीं किया है.

पुरस्कार के लिए लोग बाहर से बड़ी टुसू प्रतिमाएं लेकर आते हैं

मूर्तिकारों का कहना है कि पहले वे हर साल पांच से छह टुसू की मूर्तियां बनाते थे, लेकिन कई बार वे भी नहीं बिक पाती थीं. वर्तमान में टुसू मेले में पुरस्कार के लिए लोग बाहर से बड़ी और आकर्षक टुसू प्रतिमाएं लेकर आते हैं, जिससे स्थानीय कारीगरों की मांग और भी कम हो गयी है. इस बार 23 जनवरी को सरस्वती पूजा होने के कारण मूर्तिकारों ने टुसू के बजाय मां सरस्वती की मूर्तियों पर अधिक ध्यान केंद्रित किया है.

800 से 3 हजार रुपये तक की हैं मूर्तियां

मूर्तिकार विकास दलाई और कंगला दलाई ने बताया कि इस वर्ष वे लगभग 70 से 80 मां सरस्वती की मूर्तियां बना रहे हैं. इन मूर्तियों की कीमत 800 रुपये से लेकर 3000 रुपये तक है. अधिकतर मूर्तियों के ऑर्डर पहले ही मिल चुके हैं. अन्य वर्षों में वे कुछ टुसू प्रतिमाएं जरूर बनाते थे, लेकिन इस बार मांग नहीं होने और सरस्वती पूजा नजदीक होने के कारण पूरी तरह देवी सरस्वती की मूर्तियों के निर्माण में जुटे हुए हैं.

बसंत पंचमी उत्सव में दिखेगी लोक कलाकारों की झलक

उधर, हेंदलजुड़ी पंचायत में बसंत पंचमी उत्सव हर वर्ष धूमधाम से मनाया जाता है. इस बार 23 जनवरी को सरस्वती पूजा होने के कारण लोक कलाकार तेजी से अपनी-अपनी कलाकृतियों को आकार देने में जुटे हैं. मकर संक्रांति, गणतंत्र दिवस और नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती भी इसी अवधि में होने से आयोजनों की तैयारियां और चुनौतीपूर्ण हो गयी हैं. हेंदलजुड़ी का बसंत उत्सव क्षेत्र में काफी विख्यात है. यहां कलाकार अपनी कलाकृतियों के माध्यम से सामाजिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय संदेश देते हैं. इस वर्ष भी कई विषयों पर आधारित कलाकृतियां तैयार की जा रही हैं, जिनमें लोक संस्कृति और समसामयिक मुद्दों की झलक देखने को मिलेगी.

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Published by: Akash

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