पगडंडी पर चल रहे, खाल का पानी पी रहे
मुसाबनी : मुसाबनी प्रखंड की गोहला पंचायत में पहाड़ों पर बसे सारूदा गांव में आज तक विकास की एक किरण नहीं पहुंची है. 21 वीं सदी में यह गांव सड़क, बिजली, पानी, चिकित्सा समेत सभी मूलभूत सुविधाओं से मरहुम है. सांसद और विधायक और सरकारी हुकमरानों की बात तो दूर, आज तक मुखिया और पंचायत […]
मुसाबनी : मुसाबनी प्रखंड की गोहला पंचायत में पहाड़ों पर बसे सारूदा गांव में आज तक विकास की एक किरण नहीं पहुंची है. 21 वीं सदी में यह गांव सड़क, बिजली, पानी, चिकित्सा समेत सभी मूलभूत सुविधाओं से मरहुम है. सांसद और विधायक और सरकारी हुकमरानों की बात तो दूर, आज तक मुखिया और पंचायत सेवक के पांव भी इस गांव में नहीं पड़े हैं.
सभी ने इस गांव को उपेक्षा की नजरों से देखा है. यहां के ग्रामीण पगडंडी पर चलते हैं, खाल का पानी पीते हैं, बीमारी से जुझते हैं और सरकार तथा जन प्रतिनिधियों को कोसते हैं.
गांव जाने के लिए सड़क नहीं. 22 परिवार वाले इस गांव में सड़क नहीं है. ग्रामीण गर्भवती महिला को तीन किमी पहाड़ी रास्ते में खटिया में ढोकर विक्रमपुर मुख्य सड़क तक ले जाते हैं. फिर वहां से वाहन से मुसाबनी या डुमरिया ले जाते हैं. गांव तक
जाने के लिए आज तक एक सड़क नहीं बन पायी है.
श्रमदान से बना रहे हैं सड़क. सड़क बनाने की फरियाद किसी ने नहीं सुनी, तो ग्रामीणों ने श्रमदान से सड़क बनाने का निर्णय लिया. सारूदा, त्रियाबेड़ा, बड़वाकोचा के ग्रामीण बड़वाकोचा के ग्राम प्रधान राकेश लियांगी की अध्यक्षता में बैठक कर श्रमदान से सारूदा से त्रियाबेड़ा तक सड़क बनाने का निर्णय लिया. बैठक में प्रत्येक घर से एक-एक व्यक्ति ने सड़क निर्माण में श्रमदान करने का निर्णय लिया. राकेश लियांगी के अनुसार यदि किसी परिवार से कोई श्रमदान में शामिल नहीं होगा तो उससे प्रतिदिन 120 रुपये की दर से जुर्माना देने का निर्णय लिया गया.
ग्रामीणों ने श्रमदान से करीब तीन किमी सड़क का निर्माण अब तक किया है. सोमवार को सारूदा के ग्रामीण ग्राम प्रधान राकेश लियांगी के नेतृत्व में श्रमदान करने जुटे थे.
खाल का पानी पीते हैं ग्रामीण. सारूदा में सरकारी कुआं तथा चापाकल नहीं है. निजी कुआं भी नहीं है. एक गड्ढे में भरा सारू झरना का प्रदूषित पानी पीते हैं. सड़क के अभाव में यहां बोरिंग वाहन नहीं पहुंच पाता है. ग्रामीणों के अनुसार गर्मी में जब गड्ढे का पानी सूख जाता है, तो पेयजल संकट
से जुझना पड़ता है.
आंगनबाड़ी से वंचित हैं बच्चे. सारूदा के बच्चे आंगनबाड़ी केंद्र नहीं जाते हैं. गांव से चार मिकीदूर बिक्रमपुर गांव में आंगनबाड़ी केंद्र है. पैदल पहाड़ी पगडंडी से पोषाहार लेने तथा पढ़ने के लिए गांव के बच्चे आंगनबाड़ी नहीं जा पाते हैं. सारूदा के बच्चों को शिक्षा के लिए भी विक्रमपुर तक की दूरी तय करनी पड़ती है.