आम जनता व युवाओं के संघर्षों का चित्रण है विश्वगुरु

दुमका में नीलोत्पल मृणाल के साथ उनके उपन्यास ‘विश्वगुरु’ पर पाठकों ने साहित्यिक संवाद किया. समाज और समकालीन यथार्थ पर गंभीर विमर्श किया.

दुमका. दुमका स्थित वन विश्राम गृह में युवा साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित, समकालीन हिंदी साहित्य के चर्चित कथाकार नीलोत्पल मृणाल के साथ एक विशेष बुक बैठक एवं साहित्यिक संवाद कार्यक्रम का आयोजन किया गया. शांत प्राकृतिक परिवेश में आयोजित इस बैठक ने साहित्य, समाज और समकालीन यथार्थ पर गंभीर विमर्श का अवसर प्रदान किया. कार्यक्रम में साहित्यप्रेमी पाठक, युवा लेखक, शिक्षाविद, शोधार्थी एवं सामाजिक कार्यकर्ता बड़ी संख्या में उपस्थित रहे. बैठक का केंद्र बिंदु नीलोत्पल मृणाल का नवीनतम और बहुचर्चित उपन्यास ‘विश्वगुरु’ रहा. चर्चा के दौरान उपन्यास की कथा-वस्तु, उसके सामाजिक और राजनीतिक निहितार्थ, सत्ता संरचना पर की गयी तीखी टिप्पणी तथा आम जनता और युवाओं के संघर्षों के चित्रण पर विस्तार से बात हुई. नीलोत्पल मृणाल ने बताया कि ‘विश्वगुरु’ दरअसल उस दौर की कथा है, जहां बड़े-बड़े नारों और दावों के बीच आम आदमी और युवा वर्ग अपनी मेहनत से व्यवस्था का बोझ ढोने को मजबूर है. कार्यक्रम में उपस्थित पाठकों ने उपन्यास के कथानक, किरदारों की मानसिक संरचना, प्रतीकात्मकता और भाषा-शैली को लेकर प्रश्न किए. विशेष रूप से उपन्यास के कवर पेज पर गहन चर्चा हुई, जिसमें बाघ द्वारा रथ खींचे जाने और रथ पर बैठे चार सियारों के दृश्य को लेकर जिज्ञासा व्यक्त की गयी. नीलोत्पल मृणाल ने स्पष्ट किया कि यह कवर केवल दृश्य सजावट नहीं, बल्कि उपन्यास की वैचारिक आत्मा का प्रतीक है, जो सत्ता, अवसरवाद और जनता के शोषण को रूपक के माध्यम से अभिव्यक्त करता है. बुक बैठक में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दौर में साहित्य और उपन्यास लेखन की चुनौतियों पर भी गंभीर संवाद हुआ. नीलोत्पल मृणाल ने कहा कि तकनीक लेखन की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है, लेकिन मानवीय संवेदना, अनुभव और नैतिक प्रश्नों की जगह कोई भी तकनीक नहीं ले सकती. उन्होंने कहा कि आज लेखक के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल लिखना नहीं, बल्कि पाठक को विचारशील बनाए रखना और किताब से भावनात्मक रूप से जोड़ना है. उन्होंने इस बात पर विशेष बल दिया कि आज के लेखन के लिए केवल उपन्यास या साहित्य पढ़ना पर्याप्त नहीं है. एक जिम्मेदार लेखक को इतिहास, समाजशास्त्र, राजनीति, भूगोल, विज्ञान, अर्थव्यवस्था और वैश्विक घटनाक्रम की समझ भी विकसित करनी चाहिए. नीलोत्पल मृणाल ने कहा कि व्यापक अध्ययन ही लेखन को गहराई देता है और रचना को समय की सीमाओं से बाहर ले जाता है. बैठक में इस प्रश्न पर भी विमर्श हुआ कि लेखक अपने लेखन को कालजयी कैसे बना सकता है. इस संदर्भ में नीलोत्पल मृणाल ने कहा कि जो साहित्य अपने समय की सच्चाइयों से आंख मिलाकर बात करता है और सत्ता या लोकप्रियता के दबाव में समझौता नहीं करता, वही साहित्य लंबे समय तक प्रासंगिक रहता है. उन्होंने युवाओं को सलाह दी कि वे तात्कालिक प्रसिद्धि के बजाय दीर्घकालिक साहित्यिक मूल्यों और सामाजिक जिम्मेदारी को प्राथमिकता दें. कार्यक्रम के अंत में उपस्थित साहित्यप्रेमियों ने इस तरह की बुक बैठकों और साहित्यिक संवादों को निरंतर आयोजित करने की आवश्यकता पर जोर दिया. सभी ने माना कि ऐसे आयोजनों से लेखक और पाठक के बीच सीधा संवाद स्थापित होता है, जिससे साहित्य के प्रति समझ और संवेदना दोनों का विस्तार होता है. इस दौरान वन प्रमंडल पदाधिकारी सात्विक, युवा साहित्यकार अंजनी शरण, दुर्गेश चौधरी, अभिषेक आनंद, सुमन झा, राजीव रंजन, सौरभ आदि मौजूद थे.

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By BINAY KUMAR

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