दुमका: 20 साल से ताड़ के पत्तों की छांव में पक रहा 33 बच्चों का निवाला, जानें रानीश्वर के इस स्कूल का हाल.

रानीश्वर के एक सरकारी स्कूल में 20 सालों से बच्चों के लिए मध्याह्न भोजन ताड़ के पत्तों की झोपड़ी में बनाया जा रहा है. 33 बच्चों के इस स्कूल में अभी तक किचन शेड का निर्माण नहीं हुआ है, जिससे रसोइया और शिक्षक कीड़े-मकोड़ों के गिरने की आशंका से चिंतित रहते हैं.

रानीश्वर : बिलकांदी पंचायत के आदिम जनजाति पहाड़िया बहुल गांव चकइंद्रप्रसाद में स्कूल भवन बनने के 20 सालों बाद भी किचन शेड नसीब नहीं हो सका. वर्ष 2002 में झारखंड शिक्षा परियोजना के तहत इस गांव में अभियान विद्यालय खोला गया था और बच्चों को पढ़ाने के लिए दो पारा शिक्षकों की बहाली की गई थी. बाद में अभियान विद्यालय से अपग्रेड करते हुए इसे उत्क्रमित प्राथमिक विद्यालय बनाया गया. वर्ष 2006-07 में स्कूल के दो कमरे, बरामदा, कार्यालय कक्ष, स्टोर रूम और अलग से शौचालय का निर्माण कराया गया, लेकिन बच्चों के लिए मध्याह्न भोजन (एमडीएम) पकाने हेतु किचन शेड का निर्माण आज तक नहीं हो सका.

झोपड़ी में बनाया जा रहा है भोजन व संयोजिका चुड़की सोरेन | Prabhat Khabar Network

जोखिम में बच्चों का निवाला: ताड़ के पत्तों के नीचे बनता है खाना

बच्चों के लिए भोजन बनाने हेतु स्कूल के बरामदे से सटे बांस का खूंटा गाड़कर ताड़ के पत्तों की छावनी से झोपड़ीनुमा किचन शेड बनाया गया है. इसी झोपड़ी में बच्चों के लिए भोजन तैयार किया जाता है. इस वजह से खाना बनाते समय हमेशा जहरीले कीड़े-मकोड़े गिरने की आशंका बनी रहती है, जिससे रसोइया और शिक्षक लगातार चिंतित रहते हैं.

भोजन ग्रहण करते बच्चे | Prabhat Khabar Network

33 बच्चे हैं नामांकित

स्कूल में पहली से पांचवीं कक्षा तक कुल 33 बच्चे नामांकित हैं. पारा शिक्षक सह स्कूल प्रबंधन समिति के सचिव सनातन दास ने बताया कि स्कूल में बच्चों की औसत उपस्थिति 25 रहती है. एमडीएम के लिए प्रति बच्चा प्रतिदिन 100 ग्राम चावल और 6.78 रुपये की दर से परिवर्तन लागत प्राप्त होती है. इसी राशि से तेल, मसाला, दाल, सब्जी और जलाने के लिए लकड़ी खरीदनी पड़ती है.

बजट की कमी: गैस सिलिंडर महंगा, लकड़ी के चूल्हे पर निर्भरता

भोजन पकाने के लिए स्कूल में रसोई गैस कनेक्शन लिया गया है, लेकिन महीने में दो सिलिंडर की आवश्यकता होती है, जिस पर लगभग दो हजार रुपये का खर्च आता है. बजट की कमी के कारण अक्सर लकड़ी के चूल्हे पर ही भोजन बनाना पड़ता है.

विभाग से पहल की मांग

संयोजिका चुड़की सोरेन ने बताया कि किचन शेड निर्माण के लिए शिक्षा विभाग के अधिकारियों का ध्यान कई बार आकृष्ट कराया गया है, फिर भी स्थिति जस की तस है. आंधी या तेज बारिश के दौरान झोपड़ी में खाना बनाना बेहद कठिन हो जाता है. ग्रामीणों और विद्यालय प्रबंधन ने विभाग से जल्द से जल्द पक्के किचन शेड निर्माण की मांग की है.

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लेखक के बारे में

By साधन सेन

वर्ष 1999 के नवंबर महीने से प्रभात खबर अखबार में पत्रकारिता शुरू की. दुमका के रानीश्वर प्रखंड से पत्रकारिता करते हुए जनहित की खबरों को प्राथमिकता देना, हमेशा मेरा ध्येय रहा है.

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