ओलचिकी लिपि को अवैज्ञानिक बताकर किया विरोध-प्रदर्शन

दुमका में ओलचिकी लिपि के विरुद्ध शिक्षक, छात्र व बुद्धिजीवियों ने निकाली रैली

ओलचिकी अवैज्ञानिक और त्रुटिपूर्ण लिपि: प्रो प्रतिनाथ दुमका में ओलचिकी लिपि के विरुद्ध शिक्षक, छात्र व बुद्धिजीवियों ने निकाली रैली संताली भाषा की देवनागरी लिपि के समर्थन में दुमका में विशाल रैली संवाददाता, दुमका संताल परगना स्टूडेंट यूनियन, सिदो-कान्हु मुर्मू विश्वविद्यालय, दुमका द्वारा रविवार को ओलचिकी लिपि के विरोध और संताली भाषा की पढ़ाई देवनागरी लिपि में जारी रखने की मांग को लेकर भव्य रैली आयोजित की गई पारंपरिक वेशभूषा में बड़ी संख्या में लोगों ने इस रैली में हिस्सा लिया रैली आंबेडकर चौक, दुमका से शुरू होकर कन्वेंशन सेंटर एग्रो पार्क तक पहुंची, जहां आम सभा का आयोजन किया गया रैली का मुख्य उद्देश्य देवनागरी लिपि को संताली भाषा के लिए उपयुक्त बताते हुए ओलचिकी लिपि को अवैज्ञानिक और दोषपूर्ण करार देना था प्रतिभागियों ने मांग की कि ओलचिकी लिपि को जबरन थोपने के प्रयास बंद किये जायें इस रैली का नेतृत्व संगठन के अध्यक्ष विमल मुर्मू, छात्र नेता दीलिप टुडू, आनंद हेम्ब्रम, सचिन कुमार सोरेन, राजेश पौरिया और प्रेमलता मुर्मू सहित अन्य सदस्यों ने संयुक्त रूप से किया रैली का शुभारंभ आंबेडकर चौक पर डॉ बाबासाहेब आंबेडकर की प्रतिमा पर माल्यार्पण के साथ किया गया सभा को संबोधित करते हुए संगठन के अध्यक्ष विमल मुर्मू ने कहा कि देवनागरी लिपि ही संताली भाषा के लिए सबसे उपयुक्त और वैज्ञानिक है उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ लोग ओलचिकी लिपि के माध्यम से अपनी राजनीतिक स्वार्थ साधने और आदिवासी समाज को विभाजित करने का प्रयास कर रहे हैं उन्होंने कहा कि संताली भाषा प्रेमियों का समुदाय अपनी भाषा को बचाने के लिए किसी भी संघर्ष से पीछे नहीं हटेगा एसकेएमयू की पूर्व प्रति कुलपति डॉ प्रमोदिनी हांसदा ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि संताल परगना की संताली भाषा सबसे शुद्ध और मानक मानी जाती है उन्होंने भाषा विज्ञान के सर्वेक्षण का हवाला देते हुए बताया कि संताल परगना में संताली भाषा की पढ़ाई 1978 में एसपी कॉलेज, दुमका में शुरू हुई थी और मैट्रिक स्तर तक यह पढ़ाई 1940 से पहले ही प्रारंभ हो गई थी उन्होंने कहा कि देवनागरी लिपि सहज, सरल और वैज्ञानिक रूप से परिपूर्ण है, जो संताली भाषा को सटीक रूप में व्यक्त करने में सक्षम है इसके उपयोग से संताली भाषा और साहित्य को नई ऊंचाइयों तक पहुंचने का अवसर मिला है और समाज के लोगों को विभिन्न क्षेत्रों में प्रगति करने का लाभ मिला है गोड्डा कॉलेज, गोड्डा के संताली विभाग के अध्यक्ष प्रो प्रतिनाथ हांसदा ने ओलचिकी लिपि के उपयोग से संताली भाषा को होने वाले संभावित नुकसान पर विस्तारपूर्वक प्रकाश डाला उन्होंने स्वीकार किया कि एक समय वे भी भावनात्मक कारणों से इस लिपि के प्रचारक थे, लेकिन भाषा विज्ञान और व्याकरण के गहन अध्ययन के बाद उन्होंने इसकी त्रुटियों को समझा और इससे होने वाले खतरों का एहसास किया उन्होंने कहा कि यदि ओलचिकी लिपि को लागू किया गया तो यह संताली भाषा के विकास में बाधक बन जायेगी स्नातकोत्तर संताली विभाग की वरीय प्राध्यापिका और ऑल इंडिया यूनिवर्सिटी संताल टीचर एसोसिएशन की अध्यक्ष डॉ शर्मिला सोरेन ने विषय प्रवेश करते हुए कहा कि संताल परगना की संताली भाषा मानक और समृद्ध है उन्होंने युवाओं से आग्रह किया कि वे अपनी भाषा और संस्कृति को सुरक्षित रखने के लिए आगे आएं और किसी विशेष लिपि के नाम पर भ्रमित न हों गोड्डा कॉलेज के सहायक प्राध्यापक प्रो योगेश चंद्र किस्कू ने भी ओलचिकी लिपि को अवैज्ञानिक और दोषपूर्ण बताते हुए इसका खंडन किया सभा को प्रो सनातन मुर्मू, डॉ अविनाश हांसदा, डॉ मेरी माग्रेट टुडू, अधिवक्ता भीम प्रसाद मंडल और समाजसेवी रासका हेम्ब्रम ने भी संबोधित किया सभा के अंत में वक्ताओं ने एकमत होकर संताली भाषा की पढ़ाई देवनागरी लिपि में ही जारी रखने और ओलचिकी लिपि को जबरन थोपे जाने के विरोध में आवाज बुलंद करने का संकल्प लिया उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे अपनी भाषा और सांस्कृतिक विरासत को बचाने के लिए एकजुट होकर आगे बढ़ें मौके पर जितेश टुडू, कुलदीप सोरेन, पर्वती सोरेन,नीता किस्कू,सायबालिनी हांसदा,साईमन हांसदा, बाबुधन मुर्मू अंथोनी हांसदा,लखीन्दर मुर्मू, अल्फ्रेड मुर्मू आदि छात्र छात्राएं उपस्थित थे ——————–

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By Prabhat Khabar News Desk

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