धनबाद के कोयला खनन प्रभावित क्षेत्रों में भूजल की गुणवत्ता को लेकर आइआइटी आइएसएम के अध्ययन ने चिंता बढ़ाने वाली तस्वीर सामने रखी है. संस्थान के पर्यावरण विज्ञान एवं इंजीनियरिंग विभाग ने 262 पानी के नमूनों की जांच की, जिनमें 54.96% नमूने पीने योग्य नहीं पाये गये. अध्ययन में सामने आया कि खराब गुणवत्ता वाले पानी के नमूनों में फ्लोराइड और फिनोल की अधिक मात्रा प्रमुख कारण रही. शोध प्रो. आलोक सिन्हा के नेतृत्व में नीतीश कुमार और श्रीनिवास पासुपुलेटी ने किया है.
झरिया, कतरास और निरसा से लिये गये थे नमूने
अध्ययन के लिए अप्रैल से मई के बीच धनबाद के खनन प्रभावित क्षेत्रों से पानी के नमूने लिये गये थे. इनमें झरिया, कतरास और निरसा कोलफील्ड शामिल थे. नमूनों में पानी के भौतिक और रासायनिक मानकों के साथ विभिन्न तत्वों और ट्रेस मेटल की भी जांच की गयी. इन जांचों के आधार पर खनन गतिविधियों का भूजल की गुणवत्ता पर पड़ने वाले प्रभाव का आकलन किया गया. अध्ययन से संबंधित शोधपत्र अब प्रकाशित हुआ है.
फ्लोराइड-फिनोल हटाने पर सिर्फ 3.44% नमूने खराब
अध्ययन की सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि पानी की गुणवत्ता को प्रभावित करने में फ्लोराइड और फिनोल की बड़ी भूमिका सामने आयी. शोध के अनुसार, यदि इन दोनों प्रदूषकों को हटाकर पानी की गुणवत्ता का आकलन किया जाये, तो पीने योग्य नहीं पाये गये नमूनों का प्रतिशत 54.96% से घटकर केवल 3.44% रह जाता है. इससे स्पष्ट होता है कि खनन प्रभावित क्षेत्रों के भूजल में इन दोनों प्रदूषकों की मौजूदगी गुणवत्ता को प्रभावित करने वाला महत्वपूर्ण कारक है.
एआइ की मदद से प्रदूषण प्रभावित क्षेत्रों की पहचान
अध्ययन में पानी की गुणवत्ता का अनुमान लगाने के लिए मशीन लर्निंग तकनीक का भी इस्तेमाल किया गया. इसके लिए तीन मॉडल तैयार किये गये. इनमें एक्सट्रीम ग्रेडिएंट बूस्टिंग यानी एक्सजीबूस्ट मॉडल सबसे अधिक सटीक रहा. इसका आर-स्क्वायर मान 0.97 रहा. शोधकर्ताओं के अनुसार, इस मॉडल की मदद से उन क्षेत्रों की पहले पहचान की जा सकती है, जहां भूजल प्रदूषण का खतरा अधिक हो सकता है. इससे सीमित संसाधनों में पानी की गुणवत्ता की निगरानी को अधिक प्रभावी बनाने में मदद मिल सकती है.
नियमित निगरानी की जरूरत
अध्ययन के निष्कर्ष धनबाद जैसे खनन प्रभावित क्षेत्रों में भूजल की नियमित निगरानी की जरूरत को रेखांकित करते हैं. खासकर झरिया, कतरास और निरसा जैसे कोयला क्षेत्रों में पानी की गुणवत्ता की लगातार जांच से प्रदूषण के स्रोत की पहचान और समय पर सुधारात्मक कदम उठाने में मदद मिल सकती है.
फ्लोराइड प्राकृतिक, फिनोल का संबंध मानवीय गतिविधियों से
शोधकर्ताओं के अनुसार, पानी में फ्लोराइड की अधिकता मुख्य रूप से प्राकृतिक भूगर्भीय प्रक्रियाओं से जुड़ी हो सकती है. भूजल जब जमीन के नीचे मौजूद चट्टानों और खनिजों के संपर्क में आता है, तो उनमें मौजूद तत्व पानी में घुल सकते हैं. वहीं, फिनोल की मौजूदगी का संबंध मानवीय गतिविधियों से अधिक पाया गया है. कोयला खनन और उससे जुड़ी औद्योगिक गतिविधियों से निकलने वाले प्रदूषक भूजल तक पहुंचकर उसकी गुणवत्ता को प्रभावित कर सकते हैं.
