धनबाद. कोयलांचल में मजदूरों और किसानों के अधिकारों की लड़ाई का इतिहास रामदेव सिंह के संघर्ष और शहादत के उल्लेख के बिना अधूरा माना जाता है. 18 सितंबर 1969 को मधुबन परसबनिया में दिनदहाड़े उनकी हत्या कर दी गयी थी. उनकी शहादत की याद में हर वर्ष 18 सितंबर को मधुबन डीजी प्लांट के समीप स्थित शहीद बेदी पर श्रद्धांजलि सभा आयोजित की जाती है. इस वर्ष उनकी शहादत को 57 साल पूरे हो रहे हैं.
शहादत की इस विरासत के बीच रामदेव सिंह के परिवार की वर्तमान स्थिति भी सवाल खड़ा करती है. उनका इकलौता बेटा नागेंद्र सिंह फिलहाल निमतल्ला (सोनारडीह) में परिवार के साथ रहकर किसी तरह जीवन-यापन कर रहे हैं. परिजनों के अनुसार परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है. नागेंद्र सिंह के दो बेटे और एक बेटी हैं. रामदेव सिंह की पत्नी का निधन वर्ष 2003 में हो चुका है. परिजनों का कहना है कि शहीद के नाम पर हर वर्ष कार्यक्रम आयोजित होते हैं, लेकिन नागेंद्र सिंह के लिए कोयला क्षेत्र में रोजगार की व्यवस्था अब तक नहीं हो सकी है.
ये भी पढ़ें: धनबाद के छाताबाद में फिर भू-धंसान, जोरदार आवाज के साथ धंसी जमीन, एक दर्जन घर क्षतिग्रस्त
मजदूर-किसानों के अधिकार के लिए उठाते थे आवाज
रामदेव सिंह उस दौर में मजदूरों और किसानों के बीच सक्रिय थे, जब निजी कंपनियों के प्रभाव और कथित शोषण के खिलाफ आवाज उठाना आसान नहीं था. आंदोलन से जुड़े लोगों के अनुसार, वे एके राय के नेतृत्व में मजदूर-किसानों के अधिकारों से जुड़े आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाते थे. उन्हें मजबूत संगठनकर्ता के रूप में याद किया जाता है. बताया जाता है कि वे गांव-गांव जाकर मजदूरों और किसानों को संगठित करते और उनकी समस्याओं को आंदोलन का हिस्सा बनाते थे.
रामदेव सिंह मूल रूप से बिहार के भोजपुर (आरा) जिले के इचारी गांव के रहने वाले थे. उनके पिता रामसंदेश सिंह तथा भाई वासुदेव सिंह और श्यामदेव सिंह मधुबन में रहते थे. खेती-किसानी छोड़कर वे परिवार के साथ मधुबन आ गये. यहां मजदूरों और किसानों की समस्याओं को करीब से देखने के बाद वे उनके अधिकारों की लड़ाई में सक्रिय हो गये.
नदखुरकी की सभा के प्रचार में जुटे थे
आंदोलन से जुड़े लोगों के अनुसार, मजदूरों और किसानों को भयमुक्त करने के उद्देश्य से बाघमारा के नदखुरकी में सीपीआइएम के बंगाल के सांसद मोहम्मद इस्माइल की सभा प्रस्तावित थी. रामदेव सिंह सभा को सफल बनाने के लिए लगातार प्रचार-प्रसार कर रहे थे. इसी दौरान 18 सितंबर 1969 को मधुबन परसबनिया में उनकी हत्या कर दी गयी.
आंदोलन से जुड़े लोगों के मुताबिक, रास्ता रोककर रामदेव सिंह को जीप से उतारा गया और टांगी व फरसा से हमला कर उनकी हत्या कर दी गयी. घटना के बाद इलाके में आक्रोश फैल गया. इसके बाद मजदूर-किसानों का आंदोलन और तेज हुआ. हालांकि, घटना के इन विवरणों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध सामग्री से नहीं हो सकी है.
शहादत के बाद आंदोलन को मिली नई ताकत
आंदोलन से जुड़े लोगों का कहना है कि रामदेव सिंह की हत्या के बाद मजदूर और किसान बड़ी संख्या में एकजुट हुए. उनके अनुसार, इसी संघर्ष के दौर ने आगे चलकर मजदूर आंदोलन को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी और बीसीकेयू के गठन की जमीन मजबूत हुई.
रामदेव सिंह की पहचान मजदूर-किसानों के सवाल को बाहरी-भीतरी की राजनीति से ऊपर रखने वाले कार्यकर्ता के रूप में भी की जाती है. आंदोलन से जुड़े लोगों के अनुसार, बिहार से आने के बावजूद उन्होंने झारखंड के मजदूरों और किसानों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया और इसी संघर्ष के दौरान उनकी हत्या हुई.
18 सितंबर को शहीद बेदी पर होगी श्रद्धांजलि सभा
हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी 18 सितंबर को मधुबन डीजी प्लांट के समीप स्थित रामदेव सिंह की शहीद बेदी पर श्रद्धांजलि सभा आयोजित की जायेगी. संगठन के नेता और कार्यकर्ता उनकी शहादत और मजदूर-किसानों के लिए किये गये संघर्ष को याद करेंगे.
इस बार कार्यक्रम के साथ रामदेव सिंह के परिवार की वर्तमान स्थिति भी चर्चा में है. एक ओर उनकी शहादत की विरासत को हर वर्ष याद किया जाता है, वहीं परिजनों के अनुसार उनके इकलौते बेटे का परिवार आज भी रोजगार और आर्थिक स्थिरता की चुनौती से जूझ रहा है.
ये भी पढ़ें: SNMMCH Dhanbad: सर्पदंश के बढ़ते मामलों के बीच मंडराया संकट, जानिए कितना बचा है ASV एंटी वेनम का स्टॉक
