धनबाद. यूपीआइ भुगतान पर प्रस्तावित शुल्क को लेकर धनबाद के व्यापारिक संगठनों में नाराजगी है. चेंबर पदाधिकारियों का कहना है कि सरकार ने डिजिटल और नकदी रहित भुगतान को बढ़ावा देकर यूपीआइ को रोजमर्रा के लेन-देन का हिस्सा बनाया है. अब इस पर शुल्क लगाने से कारोबार की लागत बढ़ेगी और पहले से मंदी, ऑनलाइन कारोबार और कम लाभांश की चुनौती झेल रहे खुदरा कारोबार पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा.
व्यापारिक संगठनों ने सरकार से प्रस्तावित शुल्क के निर्णय पर पुनर्विचार करने की मांग की है. उनका कहना है कि डिजिटल भुगतान को प्रोत्साहित करने की जरूरत है, न कि उस पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डालने की.
शुल्क लगा तो नकद भुगतान की ओर लौट सकते हैं लोग
बैंक मोड़ चेंबर के अध्यक्ष प्रमोद गोयल ने कहा कि डिजिटल भुगतान से नकदी छापने और उसके वितरण की लागत कम होती है और अर्थव्यवस्था में पारदर्शिता बढ़ती है. ऐसे में सरकार को शुल्क लगाने के बजाय डिजिटल भुगतान को प्रोत्साहित करना चाहिए.
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उन्होंने कहा कि शुल्क लगने से लोग दोबारा नकद भुगतान की ओर लौट सकते हैं. यूपीआइ सफल पहल है, इसलिए सरकार को इस संबंध में पुनर्विचार करना चाहिए.
व्यापारियों की लागत बढ़ने की आशंका
जिला कांग्रेस व्यापार एवं उद्योग प्रकोष्ठ के जिलाध्यक्ष प्रभात सुरोलिया ने कहा कि सरकार ने पहले डिजिटल लेन-देन को बढ़ावा देकर व्यापारियों को यूपीआइ अपनाने के लिए प्रेरित किया. अब शुल्क वसूली उचित नहीं है. अतिरिक्त शुल्क से व्यापारियों की लागत बढ़ेगी और पहले से दबाव झेल रहे कारोबार पर इसका असर पड़ेगा.
त्योहारी सीजन में अतिरिक्त बोझ की चिंता
चेंबर ऑफ कॉमर्स, पुराना बाजार के अध्यक्ष सोहराब खान ने कहा कि व्यवसाय पहले से मंदी के दौर से गुजर रहा है. ऐसे में यूपीआइ भुगतान पर शुल्क लगाने की बात दुकानदारों पर अतिरिक्त बोझ डालने वाली है.
उन्होंने कहा कि पहले लोगों को नकदी रहित भुगतान की आदत लगायी गयी और अब शुल्क की बात हो रही है. इसका सीधा असर कारोबार पर पड़ेगा. खासकर त्योहारी सीजन में यूपीआइ भुगतान पर शुल्क लगाने का निर्णय व्यापारियों के लिए परेशानी बढ़ा सकता है. सरकार को अतिरिक्त बोझ डालने के बजाय डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देना चाहिए.
'एमडीआर नहीं, जीसीआर कहा जाना चाहिए'
बाजार समिति चेंबर ऑफ कॉमर्स के अध्यक्ष जितेंद्र अग्रवाल ने कहा कि सरकार एक ओर नकदी रहित भारत और यूपीआइ को बढ़ावा देती है, वहीं दूसरी ओर शुल्क लगाने की बात हो रही है. व्यापारी पहले से कम लाभांश पर काम कर रहे हैं और अतिरिक्त शुल्क का असर अंततः आम जनता पर पड़ सकता है.
उन्होंने कहा कि जिस शुल्क को एमडीआर यानी मर्चेंट डिस्काउंट रेट कहा जा रहा है, उसमें व्यापारी को कोई छूट नहीं मिलती. इसलिए इसे 'गवर्नमेंट कमीशन रेट' कहा जाना चाहिए.
एक ही भुगतान पर कई स्तर पर बढ़ सकती है लागत
बैंक मोड़ चेंबर के महासचिव लोकेश अग्रवाल ने कहा कि यूपीआइ से कारोबार संबंधी लेन-देन पर 0.40 प्रतिशत शुल्क की बात सामने आयी है. उनके अनुसार यह व्यावहारिक नहीं है. व्यापारी पहले ही कम लाभांश में कारोबार कर रहे हैं. शुल्क लगने से उनका लाभांश और कम होगा.
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उन्होंने कहा कि छोटे दुकानदार जब बड़े व्यापारियों को भुगतान करेंगे, तब भी शुल्क लगने से एक ही राशि पर कई स्तरों पर लागत बढ़ सकती है. बैंक मोड़ चेंबर इसका विरोध करता है और जरूरत पड़ने पर आंदोलन करने की बात कही है.
