नीरज अंबष्ट
जन्मस्थली पर प्रभाव बढ़ाना पार्टी के लिए बड़ी चुनौती
2004 चुनाव का इतिहास दुहराने का होगा प्रयास
धनबाद : भगवा गढ़ बन चुके कोयलांचल में हरा झंडा लहराना झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) नेतृत्व के लिए बड़ी चुनौती है. जिस स्थान पर अलग राज्य के आह्वान के साथ झामुमो की स्थापना हुई थी, वहां आज तक झामुमो कभी संसदीय चुनाव में विजय का परचम नहीं लहरा पाया है.
इस बार झामुमो की कोशिश धनबाद एवं गिरिडीह दोनों सीटों पर महागठबंधन प्रत्याशी को जिता कर वर्ष 2004 का परिणाम दुहराने की होगी. झामुमो की स्थापना चार फरवरी 1973 को गोल्फ मैदान में दिशोम गुरु शिबू सोरेन, एके राय एवं बिनोद बिहारी महतो (अब स्वर्गीय) के नेतृत्व में हुई थी. उस समय लाल-हरा मैत्री का नारा लगा था. बाद में पूर्व सांसद एके राय ने अलग पार्टी (एमसीसी) बना कर झामुमो से किनारा कर लिया. 47 वर्ष का हो चुका झामुमो ने कई उतार-चढ़ाव देखा.
पार्टी की कमान अब युवा नेता हेमंत सोरेन के हाथ में है. एक बार राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके हेमंत सोरेन के लिए इस वर्ष होने वाले लोकसभा चुनाव में झामुमो के साथ-साथ यूपीए के प्रत्याशियों की नैया पार लगाने की बड़ी चुनौती है. चुनावी वर्ष में हो रहे स्थापना दिवस का महत्व बढ़ा हुआ है. टिकट के दावेदारों के लिए शक्ति प्रदर्शन का यह बड़ा मौका है.
धनबाद, गिरिडीह में भाजपा का वर्चस्व तोड़ना चुनौती : झामुमो के लिए इस वर्ष धनबाद एवं गिरिडीह संसदीय सीट पर भाजपा के वर्चस्व को तोड़ने की चुनौती होगी. दोनों ही लोकसभा सीट पर भाजपा का कब्जा है. इस बार भी महागठबंधन की तरफ से धनबाद से कांग्रेस तथा गिरिडीह से झामुमो के लड़ने की संभावना है. पिछले सात लोकसभा चुनाव में से छह चुनाव में यहां से भाजपा विजयी हुई है.
जबकि वर्ष 2004 में धनबाद से कांग्रेस तो गिरिडीह से झामुमो को जीत मिली थी. क्या 2004 का परिणाम इस बार भी यूपीए दुहरा पायेगा, यह देखना दिलचस्प होगा. इन दोनों संसदीय सीट में पड़ने वाली 12 विधानसभा सीटों में भी अधिकांश पर भाजपा का ही कब्जा है.
अब पहले जैसे नहीं दिखता उत्साह : झामुमो हर वर्ष चार फरवरी को गोल्फ मैदान में स्थापना दिवस मनाता है. पहले यहां पूरी रात भाषण व सांस्कृतिक कार्यक्रम चलता था. लेकिन, बदलते समय के साथ झामुमो का स्थापना दिवस कार्यक्रम का स्वरूप भी बदल गया है.
अब न वह भीड़ जुटती है और न ही पूरी रात कार्यक्रम चलता है. कुछ खास नेता ही अपने साथ समर्थकों को लेकर पहुंचते हैं. कुछ बड़े नेताओं का संबोधन होता है और कार्यक्रम भी चंद घंटों में समाप्त हो जाता है. चुनावी वर्ष में झामुमो नेतृत्व पर निर्भर करेगा कि कैसे कार्यकर्ताओं को चुनाव के लिए मोटिवेट करें. विरोधी दलों की भी इस कार्यक्रम पर पैनी नजर होगी.
