मझगांव: पश्चिमी सिंहभूम जिले के कुमारडुंगी प्रखंड के रहने वाले सूरज पूर्ति (22) और उनकी बहन जानकी कुमारी (19) आज एक ऐसी विडंबना से जूझ रहे हैं, जहां उनके वजूद पर ही कागजी संकट खड़ा हो गया है.
बचपन में ही सिर से मां का साया उठ गया और पिता माठु पूर्ति ने दूसरी शादी कर ली. उपेक्षा के इस दौर में दोनों का लालन-पालन ग्रामीणों की दया पर हुआ. आज जब वे जवानी की दहलीज पर हैं, तो उनके पास पहचान के नाम पर एक भी दस्तावेज नहीं है. जन्म प्रमाण पत्र से लेकर राशन कार्ड, आधार और वोटर कार्ड तक नहीं हैं.
सरकारी योजनाओं और बुनियादी अधिकारों से दूरी
दस्तावेज न होने के कारण ये दोनों भाई-बहन हर उस व्यवस्था से बाहर हो चुके हैं जो एक नागरिक को जीवन जीने का अधिकार देती है. राशन कार्ड के अभाव में मुफ्त अनाज नसीब नहीं है, तो वहीं आधार न होने के कारण मनरेगा, पेंशन, छात्रवृत्ति और आयुष्मान भारत जैसी कल्याणकारी योजनाएं इनके लिए किसी सपने जैसी हैं.
बैंक खाता खोलना, शिक्षा ग्रहण करना या रोजगार के लिए आवेदन करना तो दूर, एक अदद सिम कार्ड खरीदना भी इनके लिए असंभव बना हुआ है. हर सरकारी और निजी दरवाजे पर पहचान पत्र की मांग ने इनके जीवन को थम सा दिया है.
ग्राम सभा और मानवीय पहल से जगी उम्मीद की किरण
सूरज और जानकी ने झारखंड के राज्यपाल, मुख्यमंत्री और पश्चिमी सिंहभूम के उपायुक्त से गुहार लगाते हुए साफ कहा है कि उन्हें भीख नहीं, सिर्फ अपनी पहचान चाहिए. वे चाहते हैं कि ग्राम सभा, चौकीदार, आंगनबाड़ी सेविका और पंचायत स्तर के वैकल्पिक सत्यापन के आधार पर उनके वैध दस्तावेज बनाए जाएं.
नियमों के मुताबिक ऐसे मामलों में प्रशासनिक और दंडाधिकारी स्तर पर जांच कर प्रमाण पत्र जारी करने का प्रावधान है. अब देखना यह है कि क्या प्रशासन संवेदनशीलता दिखाते हुए इन बेसहारा युवाओं को कागजों की इस दुनिया में नागरिकता का हक दिला पाता है या वे यूं ही सिस्टम की भूलभुलैया में फंसे रहेंगे.
