Bokaro News : बोकारो में हर माह एक हजार से अधिक व्यस्क व बच्चे ध्वनि प्रदूषण से प्रभावित हो रहे हैं. व्यस्क व बच्चों में कम सुनाई पड़ने की समस्या लगातार बढती जा रही है. तीन जगहों के निजी इएनटी ओपीडी में प्रतिदिन 100 से अधिक व्यस्क व बच्चे कम सुनाई पड़ने की शिकायत लेकर चिकित्सक के पास आ रहे हैं. चिकित्सकों की नजर में समस्या केवल ध्वनि प्रदूषण के कारण उत्पन्न नहीं हो रही है. लगातार इलेक्ट्रॉनिक गैजेट का भी प्रभाव है. आम बोलचाल के दौरान ध्वनि की स्पीड 25 से 40 डिसेबल होती है. अधिक डिसेबल स्पीड होने के कारण कान के नस प्रभावित होते हैं. जो स्थायी रूप से बहरेपन का कारण भी बनते हैं. विश्व श्रवण दिवस पर प्रस्तुत है रंजीत कुमार की रिपोर्ट.
25 डेसीबल तक शांति का वातावरण:
टेलीविजन, टेपरिकार्डर, स्टीरियो, ट्रेनों के हॉर्न, गाड़ियों के हॉर्न, गाड़ियों का शोर आदि मशीनों से ध्वनि प्रदूषण बढ़ रहा है. ध्वनि प्रदूषण की तीव्रता डेसीबल से मापी जाती है. मनुष्य शून्य डेसीबल की तीव्रता ही सुन सकता है. लगभग 25 डेसीबल तक शांति का वातावरण बना रहता है. 80 डेसीबल पर मनुष्य में बेचैनी देखने को मिलती है. 130 से 140 डेसीबल की ध्वनि मनुष्य के लिए पीड़ादायक होती है.90 डेसीबल के अधिक ध्वनि होने पर बढ़ जाती है उत्तेजना :
ध्वनि प्रदूषण के प्रमुख कारणों में औद्योगिक संस्थान, मशीनों, टेजीविजन, रेडियो, हवाई जहाज, घरेलू उपकरण, घास काटने की मशीन आदि है. ध्वनि प्रदूषण के कारण सुनने की क्षमता कम हो जाती है. सिर में दर्द रहता है. शोर की सीमा 90 डेसीबल के ऊपर होने पर त्वचा में अचानक उत्तेजना आती है. इससे मनुष्य का स्वभाव उग्र हो जाता है. लगातार शोर से अल्सर व हृदय रोग होता है.डॉ सुनील कुमार ( इएनटी विशेषज्ञ, को-ऑपरेटिव कॉलोनी, बोकारो) :
ओपीडी में रोजाना इएनटी से जुड़े 80 मामले आते हैं. इसमें 50 के आसपास बच्चे होते हैं, जो कम सुनाई देने की समस्या से पीड़ित होते हैं. इसके बाद व्यस्क भी कम सुनने की शिकायत करते है. कान के पर्दे से जुड़ी समस्या नहीं होती है. कान के नस में परेशानी होती है. लगातार इयरफोन का उपयोग करने से भी परेशानी बढ़ रही है. परेशानी ज्यादा दिनों तक रही तो स्थायी रूप से सुनने में परेशानी होगी.केस स्टडी एक :
चास जोधाडीह मोड़ निवासी विजय कुमार अपनी 12 वर्षीया पुत्री शांति को लेकर इएनटी चिकित्सक के पास गये. बताया कई-कई बार आवाज देने पर भी नहीं सुनती है. पिछले पांच माह से परेशान हैं.केस स्टडी दो :
पेटरवार निवासी विवेक महतो अपने आठ वर्षीय पुत्र को दिखाने पहुंचे थे. श्री शर्मा ने बताया कि पहले पुत्र टीवी कम साउंड में देखता था. अब अधिक करने पर ही सुनाई देता है. यह समस्या तीन माह से है. .बहरेपन पर रखें नजर पर गोष्ठी
को-ऑपरेटिव कॉलोनी स्थित शारदा इएनटी केयर में रविवार को विश्व श्रवण दिवस की पूर्व संध्या पर ””””बहरेपन पर रखें नजर”””” पर गोष्ठी हुई. उद्घाटन डॉ सुनील कुमार, ऑडियोलॉजिस्ट सुमित रंजन व फिजियोथेरेपिस्ट डॉ शशि कुमार ने किया. डॉ सुनील ने कहा : नवजात में बहरेपन की समस्या पर नजर रखें. तेज आवाज पर नवजात नहीं चौंक रहा है, तो सावधान हो जायें. स्क्रीनिंग जरूर करायें. बहरेपन की समस्या होगी, तो समय पर पता चलेगा. लगातार बढ़ रहे ध्वनि प्रदूषण का असर नवजात पर भी हो रहा है. डॉ शशि ने कहा : बड़े होने पर इलाज करना मुश्किल हो जाता है. शिशु में जन्म के बाद निमोनिया, डायरिया, पीलिया आदि समस्या हो, तो बच्चे में बहरापन की स्थिति बढ़ जाती है. सुनाई न देना बहरेपन का हिस्सा है. बहरेपन की वजह जन्म के समय कम वजन, कान में वैक्स, पर्दे के पीछे तरल पदार्थ, चोट या कान का पर्दा फटना, संक्रमण से पर्दे पर निशान, गर्भावस्था में दवाओं का इस्तेमाल आदि. डॉ सुमित ने कहा : कोक्लियर इंप्लांट एक छोटी सी इलेक्ट्रानिक डिवाइस है. इसके भीतरी व बाहरी दोनों भाग होते हैं. यह डिवाइस सुनने के लिए उत्तरदायी कोक्लेयर नर्व को आवाज समझने के लिए उत्तेजित करती है. कोक्लियर इंप्लांट सर्जरी बेहतर सुनने में मदद कर सकती है. मौके पर गर्दन के कई हिस्से की विभिन्न प्रकार की सर्जरी की जानकारी दी गयी.डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है
