जिला कृषि विभाग ने पिछले दिन कम बारिश की आशंका व उससे निपटने की तैयारी को लेकर बैठक की थी. बैठक में कम बारिश होने की स्थिति में कौन सी फसल की खेती करनी है, किस बीज का इस्तेमाल करना है, समेत अन्य बिंदुओं पर विमर्श हुई थी. अगर कम बारिश वाली आशंका सही साबित हो गयी तो क्या होगा? बोकारो जिला में 86989 हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि है. इसमें से 33 हजार हेक्टेयर में धान की खेती होती है. 53989 हेक्टेयर पर अन्य फसलों की खेती होती है.
नदी के नाम पर है जिला का नाम, लेकिन सूखे हैं खेत
आसमान को छूने वाली चिमनियां जिला की पहचान है. लेकिन, जिला का नाम गोमिया प्रखंड में बहने वाली बोकारो नदी के नाम पर हुआ है. जिला में दामोदर नद के अलावा बोकारो नदी, कोनार, गरगा, गवई, जमुनिया, खांजो, खुसा व उरी नदी बहती है. लेकिन, फिर भी जिला के खेत मौसम पर निर्भर हैं. बिन माॅनसून खेत सूखे हैं. जिला में मात्र 9868 हेक्टेयर भूमि ही सरकार विभिन्न योजनाओं के तहत सिंचित है. यानी 10 प्रतिशत के करीब भूमि ही सिंचित है.
सिर्फ एक नहर परियोजना
जिला में सिंचाई परियोजना के नाम पर एकमात्र गवई बराज परियोजना ही खेतों की प्यास को बुझाने का काम करती है. इससे चास व चंदनकियारी के 54 गांवों के किसानों को लाभ मिलता है. 85 किमी लंबी इस परियोजना से 4636 हेक्टेयर भूमि को सिंचाई का लाभ मिलता है. इसके अलावा जिला के 5232 हेक्टेयर भूमि पर भू-संरक्षण विभाग की ओर से बने तालाब, कृषि विभाग की डीप इरिगेशन योजना, किसान समृद्धि योजना, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना, मनरेगा के तहत बने 7500 से अधिक डोभा से सिंचाई होती है. जिला में दामोदर नद से निकला तेनुघाट-बोकारो नहर भी है. 34.5 किमी लंबे इस नहर का इस्तेमाल मुख्य रूप से बोकारो इस्पात संयंत्र को जल उपलब्ध कराने के लिए होता है. कहीं-कहीं मोटर या अन्य तरीका से नहर के पानी को खेत तक पहुंचाया जाता है. सब्जी की खेती में नहर के पानी का कुछ जगह पर इस्तेमाल होता है.
सिर्फ धान ही नहीं, एक साल तक के फसल पर असर
मतलब, साफ है कि यदि माॅनसून में कम बारिश वाली विभाग व मौसम विभाग की आशंका सही साबित होती है, तो निश्चित तौर पर जिला की खेती पर असर दिखेगा. ना सिर्फ धान की खेती में बल्कि 5240 हेक्टेयर में होने वाली गेंहू की खेती व शेष में होने वाली सब्जी की खेती पर भी होगी. मिट्टी में नमी की कमी का असर एक साल तक की फसलों पर देखने को मिलेगा.
समय रहते सचेत होने की जरूरत : कृषि वैज्ञानिक
कृषि विज्ञान केंद्र, पेटरवार के कृषि वैज्ञानिक डॉ रंजय सिंह की माने तो खराब मॉनसून को सिर्फ बारिश से जोड़ कर ही नहीं देखना चाहिए. कम बारिश के कारण तापमान अधिक हो जाता है. इससे फसलों के ग्रोथ पर असर होगा. वहीं आद्रता, हवा की गति, सूर्य विकिरण समेत अन्य मौसमी गतिविधि भी प्रभावित होगी. इसका सीधा असर फसल पर होता है. डॉ रंजय सिंह ने बताया कि केंद्रीय शुष्क भूमि कृषि अनुसंधान संस्थान-हैदराबाद की विस्तृत रिपोर्ट इस संदर्भ में है. विभाग को समय रहते तमाम उपाय पर फोकस करना चाहिए. इसमें मिट्टी के सेहत बनाये रखने की दिशा में काम होता है. खेत में नमी बनाये रखने के लिए फसल के अवशेषों या सूखी घास की एक पतली परत बिछायी जाती है, जो वाष्पीकरण को रोकती है. यदि बारिश के बीच लंबा अंतराल हो, तो खेत के तालाबों में संचित पानी से फसलों को जीवन रक्षक सिंचाई देने की जरूरत होती है.
