Bokaro News : सियासत में सादगी की जीवंत मिसाल थे गौर हरिजन
Bokaro News : चंदनकियारी के पूर्व विधायक गौर हरिजन का निधन, दस साल तक बाइक पर चलकर की विधायकी.
दीपक सवाल, कसमार, चंदनकियारी विधानसभा से दो बार विधायक रहे गौर हरिजन (75 वर्ष) का शुक्रवार की सुबह करीब छह बजे निधन हो गया. उन्होंने चंदनकियारी प्रखंड के कौड़ियां गांव स्थित अपने आवास में अंतिम सांस ली. वह पिछले कुछ समय से अस्वस्थ चल रहे थे. गौर हरिजन 1990 और 1995 में विधायक निर्वाचित हुए थे. पहली बार उन्होंने भाजपा के टिकट पर जीत दर्ज की थी, जबकि दूसरी बार निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीतकर उन्होंने अपनी मजबूत जनस्वीकृति का प्रमाण दिया था. पूर्व विधायक मूलतः कसमार प्रखंड अंतर्गत बगदा गांव के निवासी थे. वे अपने पीछे पत्नी अल्पना देवी और चार पुत्र छोड़ गये हैं. निधन की खबर मिलते ही क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गयी. विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि, सामाजिक कार्यकर्ता और आम लोग बड़ी संख्या में उनके आवास पहुंचकर श्रद्धांजलि अर्पित की.
मौजूदा राजनीति के दौर में जहां चमक-दमक, शोर-शराबा और दिखावे की होड़ आम हो चली है, ऐसे समय में गौर हरिजन जैसे नेता एक दुर्लभ परंपरा के प्रतिनिधि थे. चंदनकियारी विधानसभा क्षेत्र से दो बार विधायक रहे. उन्होंने अपनी पूरी राजनीतिक यात्रा सादगी, ईमानदारी और जन सरोकारों के मूल्यों के साथ तय की. उनके लिए राजनीति ना तो पद की भूख थी और ना ही प्रतिष्ठा की सीढ़ी, बल्कि आम लोगों के सुख-दुख में सहभागी बनने का नैतिक दायित्व थी. 10 वर्षों तक विधायक रहने के बावजूद उनके जीवन में कोई बनावटीपन नहीं आया. ना काफिला, ना आलीशान गाड़ियां. सिर्फ एक साधारण मोटरसाइकिल. उसी की डिक्की में उनके जरूरी कागजात और लेटर हेड रहते थे. वे गांव-गांव जाकर लोगों से सीधे संवाद करते, समस्याएं सुनते और मौके पर ही समाधान की पहल करते थे. गौर हरिजन ने दो बार हारु रजवार को पराजित कर चंदनकियारी विधानसभा से विधायक बने. महज 174 मतों के अंतर से मिली यह जीत उनके जनसंपर्क, भरोसे और जमीन से जुड़ी राजनीति का प्रमाण बनी.जब समरेश के सम्मान में ठुकरा दिया भाजपा का टिकट
गौर हरिजन की राजनीति केवल सत्ता और पद की आकांक्षा तक सीमित नहीं थी, बल्कि उसमें रिश्तों, सम्मान और मूल्यों की गहरी समझ भी समाहित थी. वे बोकारो के पूर्व विधायक समरेश सिंह को अपना राजनीतिक पथप्रदर्शक मानते थे. उनका कहना था ‘राजनीति में जो कुछ भी पाया, उसमें दादा (समरेश सिंह) का योगदान सबसे बड़ा है.’ यह सम्मानभाव उनके जीवन का स्थायी मूल्य था, जिसका सबसे बड़ा उदाहरण 1995 के विधानसभा चुनाव में देखने को मिला. उस समय झारखंड की राजनीति उथल-पुथल के दौर से गुजर रही थी. समरेश सिंह ने भाजपा का साथ छोड़कर इंदर सिंह नामधारी के साथ झारखंड वनांचल कांग्रेस का गठन किया और स्वयं बोकारो से निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला किया. जब यह बात गौर हरिजन को पता चली, तो उन्होंने भी स्वेच्छा से भाजपा का टिकट ठुकराने का निर्णय ले लिया.डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है
