बोकारो जिला में खदानों के लिए अपनी जमीन देकर मालिक से मजदूर बने किसान, विकास के नाम पर हुआ विनाश

बोकारो जिला के कथारा, स्वांग और करगली में स्थित कोयला खदानों और कोल वाशरी के लिए अपनी जमीन देने वाले किसान आज बदहाली के कगार पर पहुंच चुके हैं और जो किसान कलतक अपने जमीन के मालिक थे वे अब दूसरों के नौकर बन चुके हैं.

बोकारो झारखंड का एक औद्योगिक जिला है, जहां बोकारो स्टील, इलेक्ट्रो स्टील, दामोदर वैली काॅरपोरेशन, कोल इंडिया के कई उद्यम स्थापित हैं. यहां कुल पांच ��र्मल पावर प्लांट हैं, जहां से पूरे राज्य सहित, बिहार, दिल्ली और रेलवे को बिजली पहुंचाई जाती है.

यह बोकारो जिला का दुर्भाग्य है कि यहां जब भी कोई नया उद्योग स्थापित हुआ तो यहां के लोगों को विकास का सब्जबाग दिखाया गया, लेकिन विकास के नाम पर बोकारो जिले का सिर्फ विनाश ही हुआ है. इस आलेख में हम बात करेंगे बोकारो जिला के तीन कोयला खदानों की जहां जिसके लिए जमीन देने वाले किसान आज बदहाली के कगार पर पहुंच गये हैं.

बोकारो जिला के कथारा, स्वांग और करगली में स्थित कोयला खदानों और कोल वाशरी के लिए अपनी जमीन देने वाले किसान आज बदहाली के कगार पर पहुंच चुके हैं और जो किसान कलतक अपने जमीन के मालिक थे वे अब दूसरों के नौकर बन चुके हैं.

विस्थापितों की समस्याओं के समाधान के लिए लगातार संघर्ष करने वाले काशीनाथ केवट ने बताया कि इन इलाकों में रहने वाले लोगों की आजीविका का मुख्य साधन खेती था. लेकिन जब सीसीएल ने उनकी जमीन ले ली और मुआवजा कौड़ी के दाम में मिला, तो ये किसान लाचार हो गये और जीविकापार्जन के लिए पलायन के लिए बाध्य हो गये.

काशी नाथ केवट ने बताया कि इन इलाकों में सीसीएल ने खदान और खदान के विस्तार के लिए 1980 से जमीन अधिग्रहित करना शुरू किया था जो अबतक जारी है. जिन किसानों की जमीन का सीसीएल ने अधिग्रहण किया, उन्हें वैकल्पिक रोजगार नहीं मिला, क्योंकि सीसीएल की शर्त यह थी कि जिनकी दो एकड़ जमीन का अधिग्रहण होगा, उन्हें ही नौकरी दी जायेगी. ऐसे में जिनकी अधिग्रहित जमीन दो एकड़ से कम थी उन्हें नौकरी नहीं मिली.

मुआवजा जो मिला वह बहुत ही कम था क्योंकि एक एकड़ जमीन पर नौ हजार रुपये मुआवजा दिया गया जबकि कहीं यह मुआवजा 13 से 25 हजार रुपये तक भी गया. स्थिति यह है कि आज भी कई विस्थापितों को मुआवजा और नौकरी नहीं मिली है.

क्या हुआ परिणाम

कोयला खदानों के नाम पर किसानों ने अपनी जमीन तो दे दी और उन्हें यह बताया गया कि उनका विकास होगा और पूरे क्षेत्र में विकास की लौ जल उठेगी.लेकिन हुआ यह है कि जमीन अधिग्रहित हो जाने के बाद वैकल्पिक रोजगार की व्यवस्था नहीं होने के बाद किसान पलायन करने लगे और दूसरे राज्यों में जाकर मजदूर बन गये. ये सस्ते मजदूर थे इसलिए मेट्रो सिटी में इनका भरपूर दोहन हुआ.

छोटे किसान जिन्हें ना तो मुआवजा ही सही से मिला और ना ही नौकरी वे भुखमरी के कगार पर आ गये. गांवों में कई ऐसे किसान थे जिनके पास जमीन कम थी तो वे दूसरों के खेत में काम करके अपना जीवन चलाते थे, लेकिन जब किसानों के पास जमीन ही नहीं रही, तो ऐसे लोग अब कहां किसानी करेंगे?

डीआर एंड आरडी प्रोजेक्ट के विस्थापित और चलकरी उतरी पंचायत के पूर्व मुखिया पंचानन मंडल ने बताया कि उनके परिवार की पांच एकड़ जमीन अधिग्रहित की गयी थी. लेकिन नौकरी किसी को नहीं मिला. अब तो मेरी उम्र 62 साल हो गयी है तो मुझे वैसे भी अब नौकरी नहीं मिलेगी. मेरे बेटे को भी नौकरी नहीं मिली. जमीन अधिग्रहित कर लिये जाने के बाद ना तो वहां खेती कर सकते हैं और ना ही उसकी खरीद-बिक्री संभव है. ऐसे में हमारा परिवार बदहाल हो गया. बेटे को बेंगलुरू जाकर काम करना पड़ा क्योंकि परिवार चलाना था. वह वहीं से कुछ पैसे भेजता है, जिससे हमारा गुजर-बसर होता है.

विस्थापितों को अभी भी नहीं मिल रहा उचित मुआवजा

काशीनाथ केवट ने बताया कि अपनी जमीन गंवाने लोगों ने इन इलाकों में कई बार आंदोलन किया और यह मांग की कि उन्हें भूमि अधिग्रहण कानून 2013 के अनुसार मुआवजा दिया जाये. इस एक्ट में यह प्रावधान है कि वर्तमान बाजार दर से चार गुणा मुआवजा दिया जायेगा. लेकिन सीसीएल ने पुराने विस्थापितों को यह कहते हुए मुआवजा देने से इनकार कर दिया कि यह कानून 2014 से प्रभावी है. अभी विस्थापितों के साथ सीसीएल ने एक समझौता किया है जिसके तहत अब अगर किसी की जमीन ली जायेगी तो प्रति एकड़ पर नौ लाख रुपये मुआवजा दिया जायेगा.

डीआर एंड आरडी प्रोजेक्ट ठंडे बस्ते में लेकिन किसान विस्थापित

सीसीएल ने डीआर एंड आरडी प्रोजेक्ट 1982 में शुरू किया था, जिसके लिए जमीन भी अधिग्रहित कर ली गयी थी. परिणाम ये हुआ कि नोटिफिकेशन के बाद से किसान का अपनी जमीन पर से हक समाप्त हो गया. लेकिन यह प्रोजेक्ट अबतक शुरू नहीं हो पाया है. इस प्रोजेक्ट के लिए 631 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया गया था जिनमें से मात्र 30 प्रतिशत को ही मुआवजा और नौकरी का लाभ मिला. बाकी लोगों को उनके हाल पर छोड़ दिया गया. इस प्रोजेक्ट के तहत दामोदर नदी और रेल मार्ग को डायवर्ट करने की योजना थी, क्योंकि दामोदर के उदर में कोयले का अकूत भंडार है.

साथ ही अभी इस इलाके में जो रेल मार्ग है वहां भी कोयले का पर्याप्त भंडार है. लेकिन अभी तक इस प्रोजेक्ट को शुरू नहीं किया जा सका है. शुरुआत में कुछ काम हुआ था, दो-तीन पुल बने थे,लेकिन फिर काम आगे नहीं बढ़ पाया. आज स्थिति यह है कि दो सौ करोड़ की यह परियोजना अब चार हजार करोड़ की हो चुकी है, लेकिन अबतक इसपर काम नहीं हो रहा है. जबकि किसानों को विकास का सब्जबाग दिखाया गया था. अभी भी कभी कभार इस परियोजना को शुरु करने की बात होती है लेकिन फिर परिणाम ढाक के तीन पात.

खदानों का दुष्प्रभाव

खदानों का दुष्प्रभाव पूरे इलाके में दिखता है. सबसे ज्यादा जो समस्या नजर आती है वह है डस्ट के कारण सांस संबंधी बीमारी. इसके अलावा कोल वाशरी के कारण नदियों में प्रदूषण. साथ ही खदानों से निकलने वाले ओवर बर्डन (कोयले की खुदाई में निकलने वाले डस्ट) की डंपिंग नदी किनारों में किये जाने से नदियां संकरी होती जा रही है, जिसका दुष्प्रभाव इंसानों और पशु-पक्षियों के साथ-साथ पर्यावरण पर भी पड़ रहा है.

Posted By : Rajneesh Anand

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Published by: Rajneesh anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.

राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.

रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

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