Bokaro News : बोकारो जिला में 10 साल में मिले यक्ष्मा के 30181 मरीज

Bokaro News : बोकारो जिला में पिछले 10 वर्षों में 30181 यक्ष्मा मरीजों की पहचान हुई है.

बोकारो

जिला में पिछले 10 वर्षों में 30181 यक्ष्मा मरीजों की पहचान हुई है. विभाग के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2017 में 2793, 2018 में 3087, 2019 में 3410, 2020 में 2797, 2021 में 3274, 2022 में 3368, 2023 में 3140, 2024 में 3973, 2025 में 3744 और वर्ष 2026 में फरवरी तक 595 यक्ष्मा मरीज मिले हैं. सात वर्षों में 194 यक्ष्मा मरीजों की मौत हुई है. वर्ष 2020 में 48, 2021 में 112, 2022 में 18, 2023 में आठ, 2024 में चार और वर्ष 2025 में चार मरीजों की मौत हुई है.

नौ साल में 1811 बच्चे हुए पीड़ित

पिछले

नौ साल में 1811 बच्चों में यक्ष्मा के लक्षण मिले हैं. सबसे अधिक वर्ष 2018 में 333, वर्ष 2019 में 313, वर्ष 2020 में 373, वर्ष 2021 में 321 बच्चे पीड़ित मिले. वर्ष 2022 में 288 व वर्ष 2023 में 76, वर्ष 2024 में 50, वर्ष 2025 में 53, वर्ष 2026 में चार बच्चे यक्ष्मा से संक्रमित मिले .

जिला में 10 जगहों पर होती है जांच

बोकारो

जिला के 10 जगह यक्ष्मा जांच केंद्र संचालित है. इसमें कैंप

दो स्थित सदर अस्पताल, बेरमो, चंदनकियारी, चास, जरीडीह, नावाडीह, बीजीएच, गोमिया, पेटरवार, तेनुघाट शामिल हैं. यहां जांच के लिए मरीजों का बलगम सैंपल लिया जाता है. लैब तकनीशियन बलगम की जांच के बाद रिपोर्ट मुख्यालय को भेजते हैं. सटीक जांच के लिए सैंपल कैंप

दो स्थित सदर अस्पताल भेजा जाता है. यहां अत्याधुनिक जांच मशीन सीबी नेट व टू-नेट मशीन से जांच की जाती है.

सरकार की ओर से यक्ष्मा के मरीज के इलाज की है निशुल्क व्यवस्था

सरकार की ओर से यक्ष्मा के मरीज के इलाज की निशुल्क व्यवस्था

है. एक मरीज (फेफड़ा यक्ष्मा) पर कम से कम 25 हजार रुपये खर्च किये जाते है. इसमें छह माह की दवा, सभी तरह के जांच व हर माह पांच सौ रुपये की सहायता राशि शामिल है. इसके अलावे मरीज की स्थिति पर खर्च की राशि तय होती है. कई ऐसे मरीज होते हैं. जो काफी गंभीर स्थिति में होते हैं. ये अस्पताल में दाखिल होते हैं, जिन्हें तरह की महंगी दवा, ऑक्सीजन व पौष्टिक खाद्य पदार्थ मिलता है.

दो प्रकार का होती है यह बीमारी

यक्ष्मा (ट्यूबरक्लोसिस) बीमारी

माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरक्लोसिस जीवाणु से होता है. यह

दो प्रकार की होती है. पल्मोनरी यक्ष्मा में फेफड़े संक्रमित होते हैं. एक्स्ट्रा पल्मोनरी यक्ष्मा में फेफड़ों के बजाय शरीर के अन्य अंगों पर असर होता है. यक्ष्मा के इलाज में देरी और नियमित दवा नहीं लेने पर बैक्टीरिया में दवाओं के प्रति प्रतिरोधक क्षमता उत्पन्न हो जाती है. ऐसे में दवा असरहीन हो जाती हैं. यक्ष्मा मरीज की खांसी, छींक व प्रयोग किये गये सामान के संपर्क में आने से इस बीमारी

के फैलने का खतरा रहता है.

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By Janak singh choudhary

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