रेशम के कचरों की रजाई अंतरराष्ट्रीय बाजार में, प्रति वर्ष 50 मीट्रिक टन की मांग
शचिंद्र कुमार दास
खरसावां : तसर सिल्क के जरिये अंतरराष्ट्रीय स्तर पर झारखंड को पहचान दिलाने वाली उद्योग विभाग की उपक्रम झारक्राफ्ट अब अंतरराष्ट्रीय बाजार से तसर के कचरों से भी अपनी कीमत वसूल रही है. झारखंडी रेशम का कचरा की निर्यात इसी माह से जर्मनी को शुरू कर दिया गया है. झारक्राफ्ट को दो वर्ष पूर्व ही अपने उत्पादों के निर्यात के लिये विदेश मंत्रालय से हरी झंडी मिल चुका है.
अब रेशम के कचरों के निर्यात से झारक्राफ्ट के साथ साथ विभिन्न सामान्य सुलभ केंद्रों में कार्य करने वाली महिलाओं को आर्थिक रूप से लाभ मिलेगा. पूर्व में विभिन्न सामान्य सुलभ केंद्रों में तसर कोसा से सुत कताई के बाद रेशम के इन कचरों को फेंक दिया जाता था. अब इसके भी दाम मिलेंगे. यानी तसर कोसा का कोई भी हिस्सा बेकार नहीं जायेगा. मुख्य रूप से खरसावां कुचाई के सामान्य सुलभ केंद्रों में सुत कताई के बाद अब कचरों को भी पैक कर झारक्राफ्ट के जरिये जर्मनी निर्यात किया जाने लगा है.
रेशम के कचरों को निर्यात करने के लिये झारक्राफ्ट ने जर्मनी की कंपनी प्रोलाना से पिछले वर्ष एमओयू किया था. इस एमओयू को जमीन पर उतार दिया गया है. प्रोलाना यूरोप की अग्रणी फर्निशिंग निर्माता कंपनी है. तसर के कचरों का उपयोग ऑर्गेनिक क्विल्ट (रजाई) में अंदर भरने में किया जाता है. फिर इन क्विल्ट को अंतरराष्ट्रीय बाजार में उतारा जाता है. प्रोलाना ने झारक्राफ्ट से प्रति वर्ष 50 मीट्रिक टन तसर के कचरों की मांग की है. साथ ही प्रति किलो 875 रुपये की कीमत लगायी है. प्रोलाना को तसर कचरे के निर्यात से पूर्व उसकी प्रोसेसिंग भी झारक्राफ्ट द्वारा की जाती है.
