गरीबों के लिए जानलेवा बनती ठंड, अलाव बना आखिरी सहारा

ठिठुरन व बेबसी से जूझते गरीब

– ठंड से बेहाल गरीब, खुले आसमान के नीचे गुजर रही जिंदगी – ठिठुरन व बेबसी से जूझते गरीब सुपौल. पूस महीने की ठंड अब अपने चरम पर पहुंच चुकी है. शनिवार की सुबह आसमान पूरी तरह साफ था, लेकिन हवा में घुली सिहरन ने यह साफ कर दिया कि रात कितनी निर्दयी रही होगी. सड़कों पर अपेक्षाकृत कम आवाजाही थी. लोग रजाई में दुबके हुए थे, वहीं जो मजबूरी में बाहर निकले, वे ठिठुरते बदन के साथ अलाव की तलाश में नजर आए. जगह-जगह जलते अलाव के पास बैठे लोग हाथ सेंकते हुए एक-दूसरे से यही कहते दिखे ऐसी ठंड तो काफी दिनों बाद महसूस हो रही है, लेकिन यह ठंड सिर्फ मौसम की मार नहीं है, यह गरीब, बेघर और निसहाय लोगों के लिए किसी सजा से कम नहीं. सुबह-सुबह शहर के चौक-चौराहों, बस स्टैंड, रेलवे परिसर और फुटपाथों पर लोग अलाव के सहारे ठंडी से राहत पाने में लगे हुए थे. किसी के पैर नंगे थे, तो किसी के बदन पर सिर्फ एक पतली चादर. बुजुर्ग, मजदूर, रिक्शा चालक और सड़क किनारे जीवन बिताने वाले लोग अलाव के पास बैठे अपने-अपने दर्द साझा कर रहे थे. एक बुजुर्ग मजदूर ने कांपती आवाज में कहा रात बहुत भारी पड़ती है बाबू. ठंड हड्डियों में घुस जाती है. अलाव ही बचाता है, नहीं तो जान निकल जाए. गरीबी और बेबसी की यह तस्वीर सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि सैकड़ों ऐसे लोगों की है जो हर साल इसी मौसम में मजबूरी से जूझते हैं, जिनके लिए ठंड कोई मौसम नहीं, बल्कि एक संघर्ष है. चाय की बढ़ी डिमांड चाय की दुकानों पर भीड़ थी. लोग गरम चाय की चुस्की लेते हुए खुद को भीतर से गर्म रखने की कोशिश कर रहे थे. दुकानदार बताते हैं कि ठंड बढ़ते ही चाय की मांग बढ़ जाती है. ठंड में लोग चाय पीकर ही खुद को संभालते हैं, एक दुकानदार संतोष ने कहा प्रशासन द्वारा शहर में कुछ जगहों पर अलाव की व्यवस्था की गई है, लेकिन यह व्यवस्था जरूरत के मुकाबले नाकाफी है. कई इलाकों में लोग खुद लकड़ी, कचरा या पुराने टायर जलाकर अलाव जलाने को मजबूर हैं. इससे एक ओर ठंड से राहत मिलती है, तो दूसरी ओर जहरीला धुआं स्वास्थ्य के लिए खतरा बन जाता है. सबसे ज्यादा दिक्कत उन लोगों को होती है, जो फुटपाथ पर सोते हैं. खुले आसमान के नीचे, बिना पर्याप्त कंबल और गर्म कपड़ों के रात गुजारना किसी चुनौती से कम नहीं है. बुजुर्ग अरूण कुमार कहते हैं पूस की ठंड सिर्फ शरीर को नहीं, बल्कि इंसान की हिम्मत को भी तोड़ देती है. जब रात की सन्नाटे में ठिठुरता इंसान अपने हाथों को सांसों से गर्म करने की कोशिश करता है, तो उसकी आंखों में सिर्फ एक ही सवाल होता है सुबह होगी या नहीं? बच्चों की हालत भी चिंताजनक है. कई गरीब परिवारों के बच्चे फटे-पुराने कपड़ों में ठंड से कांपते नजर आते हैं. स्कूल जाने वाले बच्चे भी इस मौसम में बीमार पड़ रहे हैं. सर्दी, खांसी और बुखार आम हो चुका है. डॉक्टरों का कहना है कि अत्यधिक ठंड बुजुर्गों और कमजोर लोगों के लिए बेहद खतरनाक होती है. हाइपोथर्मिया, सांस की बीमारी और दिल से जुड़ी समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है. मजदूरों के लिए अलाव ही बना सहारा निर्माण कार्य में लगे दिहाड़ी मजदूर दिनभर मेहनत करते हैं, लेकिन रात में उनके पास ठहरने की कोई सुरक्षित जगह नहीं होती. शहर के बाहरी इलाके में ईंटों के ढेर के पास सो रहे मजदूर रामविलास बताते हैं, दिनभर काम करके शरीर थक जाता है, लेकिन ठंड की वजह से नींद नहीं आती. हाथ-पैर सुन्न हो जाते हैं. आग जलाने के लिए लकड़ी भी मुश्किल से मिलती है. कई मजदूर पुराने बोरे, प्लास्टिक और कपड़े लपेटकर ठंड से बचने की कोशिश करते हैं, लेकिन यह उपाय नाकाफी साबित हो रहा है. मजदूर रोज की तरह काम की तलाश में निकलते हैं, रिक्शा चालक सवारी के इंतजार में खड़े रहते हैं. फुटपाथ पर रहने वाले लोग एक और रात गुजारने की तैयारी करते हैं. इस ठंड में अलाव सिर्फ आग नहीं, बल्कि उम्मीद की लौ है. यह लोगों को यह भरोसा देता है कि वे अकेले नहीं हैं, कि अभी भी कोई गर्माहट बाकी है. अस्पताल में बढ़ी ठंड से बीमारियां सदर अस्पताल में ठंड से जुड़ी बीमारियों के मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है. सर्दी, खांसी, बुखार और निमोनिया के मामले सामने आ रहे हैं. डॉक्टरों का कहना है कि बुजुर्ग और छोटे बच्चे सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं. अस्पताल में भर्ती 65 वर्षीय शांति देवी बताती हैं कि हमारे घर में अलाव की व्यवस्था नहीं है. ठंड से शरीर अकड़ गया, फिर सांस लेने में तकलीफ होने लगी, हालांकि प्रशासन की ओर से कुछ जगहों पर अलाव की व्यवस्था की गई है, लेकिन यह जरूरत के हिसाब से काफी नहीं है. कई इलाकों में लोग अब भी अलाव के इंतजार में रात गुजार रहे हैं. सामाजिक संगठनों द्वारा कंबल वितरण का काम किया जा रहा है, लेकिन ठंड की तीव्रता को देखते हुए यह प्रयास भी सीमित नजर आ रहा है. मासूमों की सिसकियां और मां की लाचारी रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर दो पर बैठी राधा देवी अपने तीन साल के बेटे को सीने से लगाए बैठी थी. ठंड से कांपते बच्चे की नाक बह रही थी. होंठ नीले दिख रहे थे. राधा देवी की आंखों में आंसू हैं. वह कहती हैं, साहब, दिन में तो किसी तरह गुजर जाता है, लेकिन रात में यह ठंड जान ले लेती है. बच्चा रोता है, पर हमारे पास उसे ढकने के लिए दूसरा कंबल भी नहीं है. धूप में बच्चों ने की मस्ती जिले में शनिवार की दोपहर धूप निकली. धूप निकलने के साथ ही बच्चे बुजुर्ग धूप में निकल गये. ठंड को लेकर छोटे-छोटे बच्चों के स्कूलों बंद रखा गया है. लिहाजा बच्चे धूप खिलने के बाद पार्क में घूमने निकल गये. वहीं अस्पताल आये मरीज धूप में बैठ कर अपने आप को गर्म करते दिखे. वहीं आमलोगों को धूप खिलने के बाद ठंड से थोड़ी मिली. ठंड की वजह से लोग घर में ही कैद रहते थे. दोपहर में बाजार में रौनक दिखी. लोग जरूरी के सामान के लिए बाजार पहुंचे थे. दुकानदारों ने बताया कि ऐसे ही दोपहर में हर दिन यदि धूप खिले तो, उनलोगों का रोजगार पटरी पर आ जायेगा.

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