अभियंता दिवस पर वीरपुर स्थित आयोजित कार्यक्रम में जल संसाधन विभाग के शीर्ष कार्य प्रमंडल के कार्यपालक अभियंता श्री बबन पाण्डेय द्वारा रचित पुस्तक "A FIGHT WITH BUDHI GANDAK" का विमोचन समारोह में सम्पन्न हुआ. पुस्तक के आवरण पर अंकित शीर्षक ही उसके भीतर के विक्षोभ और पुरुषार्थ को व्यंजित करता है.
अभियंताओं ने संयुक्त रूप से किया पुस्तक का विमोचन
इस अवसर पर विभाग के मूर्धन्य जन उपस्थित थे. सेवानिवृत्त अभियंता प्रमुख एवं प्रमुख तकनीकी परामर्शी श्री मनोज रमन, वीरपुर के मुख्य अभियंता श्री संजीव शैलेश, फिजिकल मॉडलिंग सेंटर के मुख्य अभियंता श्री सत्येन्द्र कुमार, अधीक्षण अभियंता श्री संजय कुमार, सेवानिवृत्त अधीक्षण अभियंता सर्वश्री सहजानंद सिंह, जमील अहमद, रामेन्द्र कुमार सिंह, प्रमोद कुमार भारती, बी.के. राय तथा पी.सी. दास ने संयुक्त रूप से ग्रंथ का अनावरण किया. यह दृश्य ही इस बात का प्रमाण था कि इंजीनियरिंग केवल नाप-जोख का कार्य नहीं, एक सांस्कृतिक दायित्व भी है.
लेखक की साधना और अनुभव का विस्तार
कहा जाता है कि यह श्री पाण्डेय की छठी कृति है. इससे पूर्व भी उनकी पांच पुस्तकें प्रकाश में आ चुकी हैं. इससे यह स्पष्ट होता है कि उनके भीतर का अभियंता जब बांध और जल-स्तर से अवकाश पाता है, तब लेखक की कलम सजग हो उठती है.
लेखक ने स्वयं निवेदन किया कि इस कृति का प्रस्थान-बिंदु 22 जून, 2021 का वह दिन है, जब उन्होंने बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल, मुजफ्फरपुर में कार्यपालक अभियंता के रूप में कार्यभार ग्रहण किया था. उस समय बूढ़ी गंडक का जल अपने स्विल्स के माध्यम से नगर की ओर बढ़ रहा था. तटबंध के सम्मुख एक कठिन परीक्षा थी. प्राणों पर संकट था और कर्तव्य सामने अड़ा था. बड़ी मशक्कत और सजगता के पश्चात् बहादुरपुर कोठिया में उत्पन्न कटाव की उस भयावह और विकराल स्थिति को नियंत्रित किया जा सका. वही अनुभव, वही त्रास और वही विजय इस पुस्तक की प्राण-भूमि है.
अभियंता प्रमुख का चिंतनपरक उद्बोधन
अपने सारगर्भित संबोधन में पूर्व अभियंता प्रमुख श्री मनोज रमन ने कहा कि संगीत, चित्रकला अथवा लेखन-कला ऊपर से आरोपित वस्तु नहीं है. यह मनुष्य के अंतःकरण में निहित एक नैसर्गिक वृत्ति है, जिसे ईश्वर सहज ही किसी-किसी को दे देता है. अतः श्री बबन पाण्डेय को इस नैसर्गिक गुण के लिए ईश्वर के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए.
उन्होंने आगे कहा कि यह ग्रंथ इंजीनियरिंग-दृष्टि से एक महत्वपूर्ण पोस्टर-तुल्य है. इसमें केवल जल का वेग नहीं, मानवीय संकल्प का वेग भी है. इसलिए विभाग के प्रत्येक जन को, जो जल और मिट्टी के संघर्ष को समझना चाहता है, इस पुस्तक के एक-एक शब्द का मनोयोगपूर्वक अध्ययन करना चाहिए.
इस प्रकार यह पुस्तक केवल एक अभियंता की डायरी नहीं रह जाती, वह उस लोक-हृदय का दस्तावेज बन जाती है, जहां नदी आती है, तटबंध कांपता है और मनुष्य अपने समस्त ज्ञान और साहस के साथ उसके सामने खड़ा होता है.
