सूखे नशे की दलदल में जा रही युवाओं की टोली

युवाओं को खूब भाता है कोडीन और स्मैक

– बंदी के बाद भी शाम ढलते ही गली-मुहल्लों में शुरू हो जाता है शराब का चलता-फिरता कारोबार त्रिवेणीगंज. बिहार में शराबबंदी के सख्त कानून के बावजूद त्रिवेणीगंज शहर और आसपास के ग्रामीण इलाकों में शराब का कारोबार बेलगाम हो चुका है. तस्करों का नेटवर्क इतना मजबूत है कि अब शराब की होम डिलीवरी तक की सुविधा खुले आम उपलब्ध है, लेकिन इससे भी चिंताजनक है कि युवाओं में कोडीन (कोरेक्स) और स्मैक जैसी नशीली मादक पदार्थ की बढ़ती लत, जो शराब के साथ-साथ इस इलाके में युवा पीढ़ी को बर्बाद कर रही है. पुलिस और उत्पाद विभाग की कार्रवाई पर सवाल उठ रहे हैं. शहर के विभिन्न मोहल्लों और गांवों में अंग्रेजी शराब, कोरेक्स और स्मैक की खुलेआम बिक्री हो रही है. थाने से महज कुछ दूरी पर ही ये गोरखधंधा जोर – शोर से चल रहा है. स्थानीय निवासियों की शिकायत है कि तस्कर साइकिल, मोटरसाइकिल और स्कूटी पर थैलों में शराब और ड्रग्स भरकर गलियों में घूमते हैं. शाम होते ही शहर समेत गांवों में अवैध ठेके खुल जाते हैं, जहां देर रात तक नशे का दौर चलता रहता है. हाल ही में उत्पाद विभाग और पुलिस की संयुक्त छापेमारी हुई, लेकिन कोई ठोस परिणाम नहीं निकला. तस्करी का यह जाल अब डिजिटल हो चुका है. मोबाइल पर एक कॉल या कोड वर्ड से शराब और ड्रग्स घर तक पहुंचाए जा रहे है. शहर हो या गांव, युवा आसानी से ऑर्डर कर रहे हैं. सूत्र बताते हैं कि नेपाल, झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और हरियाणा से जुड़े गिरोह इस नेटवर्क को चला रहे हैं. सीमावर्ती क्षेत्र होने से नेपाल से शराब और स्मैक की खेप आ रही है. स्थानीय युवक इन गिरोहों के लिए डिलीवरी बॉय बनकर काम कर रहे है. युवाओं को खूब भाता है कोडीन और स्मैक इस अवैध कारोबार में सबसे ज्यादा चिंता युवाओं की बढ़ती लत है. कोरेक्स (कोडीन युक्त कफसिरप) और स्मैक (हेरोइन का रूप) अब युवाओं की पहली पसंद बन चुके है. स्कूल-कॉलेज जाने वाले छात्र और बेरोजगार युवक आसानी से उपलब्ध होने के कारण इनका सेवन कर रहे है. चिकित्सकों के अनुसार, कोडीन की लत से नींद की समस्या, अवसाद और शारीरिक कमजोरी होती है. जबकि स्मैक से मौत का खतरा रहता है. सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि शराबबंदी के बाद तस्करों ने ड्रग्स पर फोकस बढ़ाया है. ये छोटे पैकेट में आसानी से छिपाए जा सकते है. गांवों में कई युवा नशे के आदी हो चुके है. जिससे अपराध दर भी बढ़ रहा है. बच्चों की पहली पसंद बना ‘सनफिक्स’ का जहर वहीं स्कूली बच्चों के बीच नशे की लत तेजी से फैल रही है. सबसे खतरनाक बात यह है कि अब उनका सबसे आसान और सस्ता नशा स्टेशनरी की दुकानों पर खुलेआम बिकने वाला सनफिक्स व व्हाइटनर बन गया है. बच्चे इसे पॉलीथिन या रुमाल में डालकर सूंघते हैं. कुछ ही पलों में नशे में मग्न हो जाते हैं. गरीब हो या अमीर परिवार का बच्चा, यह जहर अब सबकी पहुंच में है. शहर की सड़कें, चौराहे, नहर किनारे और गांवों में 10-15 साल के बच्चे दिन-रात सनफिक्स सूंघते नजर आ रहे है. बताया जाता है कि स्टेशनरी की दुकानों से 20 से लेकर 100 रुपये में सनफिक्स आसानी से मिल जाता है. कहते हैं थानाध्यक्ष थानाध्यक्ष राकेश कुमार ने बताया कि नशे के विरुद्ध लगातार क्षेत्र में छापेमारी की जा रही है. जिससे उसमें संलिप्त तस्कर पकड़े भी जा रहे है. बताया कि नशा के विरुद्ध अभियान जारी रहेगा.

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By RAJEEV KUMAR JHA

RAJEEV KUMAR JHA is a contributor at Prabhat Khabar.

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