सुपौल : 2015 की विदाई के साथ नये वर्ष के आगमन को लेकर लोगों में खासा उत्साह है. नये वर्ष का जश्न हरेक वर्ग के लोग अपने -अपने तरीके से मनाने में जुटे हैं. 31 दिसंबर की रात को घड़ी की सूई जैसे ही 12 बजे पर पहुंची आतिशबाजी व एक दूसरे को नये वर्ष […]
सुपौल : 2015 की विदाई के साथ नये वर्ष के आगमन को लेकर लोगों में खासा उत्साह है. नये वर्ष का जश्न हरेक वर्ग के लोग अपने -अपने तरीके से मनाने में जुटे हैं. 31 दिसंबर की रात को घड़ी की सूई जैसे ही 12 बजे पर पहुंची आतिशबाजी व एक दूसरे को नये वर्ष की शुभकामना देने का सिलसिला प्रारंभ हो गया. गौरतलब है कि नये साल को लेकर लोगों की अपनी-अपनी अपेक्षाएं व आकांक्षाएं भी हैं.
सभी अतीत को छोड़ कर नये साल में नये तरीके से अलग उत्साह व उमंग के साथ अपने जीवन की नयी पारी की शुरुआत करते हैं. सबसे ज्यादा उत्साह युवा वर्ग व बच्चों में है. नये साल की शुरुआत कई तरीकों से होगी. कोई अपने माता-पिता व अभिभावक के आशीर्वाद के साथ नये साल के सुबह की शुरुआत करेंगे. बच्चे व युवा ने इस खास दिन पर दोस्तों के साथ पिकनिक मनाने की योजना बना रखी है. अधिकांश लोग नये वर्ष की शुरुआत मंदिर में जा कर पूजा अर्चना के साथ करेंगे
पिकनिक के कुछ खास स्पॉट
वैसे तो जिला मुख्यालय सहित आस-पास के क्षेत्रों में पार्क व पिकनिक मनाने के स्थानों की काफी कमी है. बावजूद लोगों का नये वर्ष को लेकर उत्साह कम नहीं दिख रहा है. गांव में जहां बच्चे व युवा नये साल का जश्न किसी बगीचे व खेत खलिहान जा कर मनाते हैं, वहीं कोसी का दियारा, कोसी महासेतु के आसपास, कोसी बराज को आज भी पिकनिक का हॉट स्पॉट माना जाता है. भारतीय संस्कृति में नये चीज की शुरुआत आम तौर पर देवी-देवताओं के पूजन से प्रारंभ करने की परंपरा रही है.
इसलिए नये वर्ष के दिन सुबह उठ कर किसी न किसी मंदिर जा कर लोग जरूर पूजा- अर्चना करते हैं. जिले में बहुत सारे मंदिर हैं, लेकिन कुछ अति महत्वपूर्ण धर्मस्थल हैं, जहां जा कर पूजा अर्चना करना लोगों की प्राथमिकता होती है. जैसे जिला मुख्यालय से सटे हरदी दुर्गा स्थान, सुखपुर स्थित तिल्हेश्वर स्थान, राघोपुर प्रखंड अंतर्गत गणपतगंज स्थित विष्णु मंदिर आदि मंदिरों में नव वर्ष में सबसे ज्यादा श्रद्धालुओं की भीड़ जमा होगी. मधेपुरा जिला अंतर्गत सिंहेश्वर स्थान, नेपाल स्थित सखड़ा भगवती मंदिर में लोग जा कर शीष नवाते हैं.
हरदी दुर्गा स्थान पर जुटेंगे लोग
जिला मुख्यालय से महज 12 किमी की दूरी पर स्थित हरदी दुर्गा स्थान जिसकी अपनी एक ऐतिहासिक पृष्टभूमि भी रही है. इसे लोरिक की धरती के रूप में भी जाना जाता है. कहा जाता है यहां पांडवों ने अपने अज्ञातवास के दौरान ही मां दुर्गा की स्थापना की थी. यही वजह है कि इस स्थान पर नव वर्ष में सबसे ज्यादा श्रद्धालुओं की भीड़ इकट्ठा होती है.