खेतों में वर्मी कंपोस्ट के प्रयोग से होगी अच्छी उपज: डा सन्हिा

खेतों में वर्मी कंपोस्ट के प्रयोग से होगी अच्छी उपज: डा सिन्हा फोटो-11,12,13,कैप्सन-कार्यशाला को संबोधित करते डा सिंहा, मंच पर अतिथि व सभा में उपस्थित अन्य.प्रतिनिधि, निर्मली अनुमंडल मुख्यालय स्थित हरि प्रसाद साह महाविद्यालय परिसर में आधुनिक कृषि प्राद्यौगिकी, जैविक खेती, पर्यावरण एवं संपोषणीय विकास के विषय पर कार्यशाला का आयोजन किया गया. डाॅ जैनेंद्र […]

खेतों में वर्मी कंपोस्ट के प्रयोग से होगी अच्छी उपज: डा सिन्हा फोटो-11,12,13,कैप्सन-कार्यशाला को संबोधित करते डा सिंहा, मंच पर अतिथि व सभा में उपस्थित अन्य.प्रतिनिधि, निर्मली अनुमंडल मुख्यालय स्थित हरि प्रसाद साह महाविद्यालय परिसर में आधुनिक कृषि प्राद्यौगिकी, जैविक खेती, पर्यावरण एवं संपोषणीय विकास के विषय पर कार्यशाला का आयोजन किया गया. डाॅ जैनेंद्र कुमार के नेतृत्व में आयोजित कार्यशाला का शुभारंभ अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक,वर्मी कंपोस्ट एवं जैव कृषि ,ब्रिसबेन अस्ट्रेलिया के डाॅ राजीव कुमार सिन्हा, अंतरराष्ट्रीय संरक्षित कृषि विशेषज्ञ व प्रबंध निदेशक एग्रीप्लास्ट टेक इंडिया प्रालि बेंगलुरू के ई राजीव कुमार राय, पटना साईंस कॉलेज के पूर्व प्राचार्य डाॅ निर्मल कुमार मिश्रा एवं भागलपुर के डाॅ जगदीश ओझा ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलित कर किया, कार्यशाला को संबोधित करते हुए वैज्ञानिक डाॅ सिन्हा ने कहा कि वर्मी कंपोस्ट एवं जैविक उर्वरक का प्रयोग करने से खेतों की उर्वरक शक्ति बरकरार रहने के साथ-साथ फसलों को कई बीमारियों से बचाया जा सकता है, कहा कि वर्मी कंपोस्ट का निर्माण केचुए के द्वारा किया जाता है. बताया कि रासायनिक खाद के उपयोग से कई ऐसी गंभीर बीमारी पनपती है जिससे फसलों को बचाने में किसानों को कठिनाई का सामना करना पड़ता है. उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि गरम पानी में सब्जी व फल को डालने पर रासायनिक तत्व निकली है जो मनुष्य के लिए जहर का काम करती है. किसान वर्मी कंपोस्ट व जैविक आधारित खेती को ही तरजीह दें. 18 वीं सदी में हुआ था जैविक खेती डा सिन्हा ने कहा कि 18 वीं सदी में आस्ट्रेलिया के वैज्ञानिक सर चार्ल्स डार्विन द्वारा केचुंए पर आधारित जैविक खाद से खेती की शुरुआत हुई थी, उन्होंने कहा कि किसान ही हमारे अन्नदाता हैं, जो राज्य के विकास के साथ-साथ देश के विकास में भी अपनी अहम भूमिका निभा रहे हैं. कहा कि अन्नदाता उपज बढ़ाने के लिये रासायनिक खादों पर अधिक बल देते हैं. जिसके कारण पर्यावरण पर भी प्रतिकूल असर पड़ता है. वहीं धरती मां की भी उर्वरक शक्ति नष्ट कर अपने ही पांव पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं. बताया कि भारत के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी को धन्यवाद देते हुए कहा कि वे विदेशों में रहने वाले प्रवासी वैज्ञानिकों कोे अनुरोध करते हुए भारत आ कर जैविक खेती को बढ़ावा देने को कहा, वहीं बैठक में उपस्थित लड़कियों को संबोधित करते हुए कहा कि बेटी आगे बढ़ो और आगे बढ़ कर देश की सेवा के लिये कृषि वैज्ञानिक बनो. कम लागत में होगी अधिक उपज ई राय ने आधुनिक कृषि प्राद्यौगिकी आधारित खेती पर बल देते हुए कहा कि संरक्षण एवं पॉलीहॉस के तरीके से खेती करने से किसानों को कम लागत में कम जमीन पर भी अधिक उपज मिल सकती है. बताया कि ऐसे किसान फल-फूल एवं सब्जी का उत्पादन कर सकते हैं. पॉलीहॉस की खेती के लिए एक एकड़ भूमि में तीस लाख गुलाब, केवरा जैसे फूलों की उपज किया जा सकता है. इस तरह की खेती से किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी. मत्स्य विभाग के डा जगदीश ओझा ने मिथिलांचल में मछली उत्पादन पर बल देते हुए कहा कि यहां की भूमि मछली पालन के लिये समुचित है. लेकिन प्रशिक्षण के अभाव में लोग मछली पालन नहीं कर पाते हैं. कार्यशाला को डाॅ निर्मल कुमार मिश्रा, जिला उद्यान पदाधिकारी व सहायक निदेशक मधुबनी अजीत कुमार यादव, अनुमंडल कृषि पदाधिकारी निर्मली संतोष कुमार सुमन,प्रबंधक दिलीप महाराज, एग्रीप्लास्ट के कृषि वैज्ञानिक नवीन कुमार सिंह, एचडीएफडी बैंक के प्रबंधक आदि ने भी संबोधित जकिया. कार्यशाला की अध्यक्षता हरि प्रसाद साह महाविद्यालय के प्राचार्य डाॅ विमल कुमार राय ने की. संचालन महाविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष डाॅ शिव कुमार प्रसाद ने किया.

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