Freedom fighter Suraj Mishra: स्वतंत्रता संग्राम के भूले-बिसरे नायकों की एक लंबी फेहरिस्त है, जिन्हें वक्त ने भुला दिया. हालांकि, पुरानी पीढ़ी के लोग उनके देशप्रेम और आजादी की लड़ाई में उनकी सक्रिय भूमिका की चर्चा आज भी करते हैं. अतीत की फीकी यादों के रूप में पड़ी इन कहानियों को फिर से उजागर करने और सामने लाने का मकसद आने वाली पीढ़ियों को स्वतंत्रता संग्राम के इन वीर योद्धाओं से जोड़ना है.
1902 में माधोपुर में हुआ था जन्म
प्रखंड के माधोपुर में पं. देवकी मिश्र के घर वर्ष 1902 में जन्मे स्वतंत्रता सेनानी सूरज मिश्र की आजादी की लड़ाई में यादगार भूमिका रही है. स्वतंत्रता सेनानी सूरज मिश्र की संघर्षगाथा लंबी है. उनके मन में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ ऐसा जज्बा था कि देश में जहां कहीं भी अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन होता था, सूरज मिश्र वहां पहुंच जाते थे.
जमालपुर गोगरी कांड में बनाये गये थे अभियुक्त
एक छोटे से गांव से निकले सूरज मिश्र का नाम पहली बार सुर्खियों में तब आया था, जब उन्हें जमालपुर गोगरी कांड का अभियुक्त बनाया गया था. डाक, तार और रेल रोको अभियान का अभियुक्त करार दिये जाने के कारण उन्हें करीब सालभर सीवान जेल में रहना पड़ा. दरअसल, अंग्रेजी सल्तनत के खिलाफ षड्यंत्र रचने का उन पर मुकदमा चला था. जेल में रहने के दौरान उन्होंने यातनाएं भी झेलीं.
गांधी के असहयोग आंदोलन में लिया बढ़-चढ़कर हिस्सा
सूरज मिश्र ने गांधी जी के असहयोग आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. स्वतंत्रता सेनानी पट्टाभी सीतारमैया, पं. ब्रह्मचारी उपाध्याय, शंभूदत्त शुक्ला आदि के सहयोगी के रूप में भी उन्होंने काम किया. उनके जीवन पर गांधी जी के विचारों का गहरा प्रभाव था. उन्होंने लखनऊ कांग्रेस अधिवेशन में कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण की.
अब्दुल गफूर को कांग्रेस में लाने में निभाई भूमिका
बताया जाता है कि पूर्व मुख्यमंत्री अब्दुल गफूर को कांग्रेस में लाने का श्रेय सूरज मिश्र को जाता है. मुख्यमंत्री रहते अब्दुल गफूर जब भी अपने घर गोपालगंज जिले के मांझा प्रखंड के सरेंया आते थे, तो क्रांतिकारी सूरज मिश्र से मिलना नहीं भूलते थे.
स्वतंत्रता सेनानियों के बच्चों की शिक्षा पर दिया जोर
स्वतंत्रता सेनानियों के बच्चों को शिक्षा दिलाने में सूरज मिश्र की गहरी रुचि थी. उनके बच्चों को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए वे सदैव प्रयत्नशील रहते थे. क्षेत्रवासियों के अनुसार, गांधी स्मारक उच्च विद्यालय, बड़हरिया खुलवाने में भी उनकी अहम भूमिका रही थी. एक तो वे महात्मा गांधी को अपना आदर्श मानते थे और दूसरा शिक्षा के प्रति उनकी गहरी रुचि थी.
पत्नी शैलजा मिश्रा ने भी दिया था पूरा साथ
स्वतंत्रता सेनानी सूरज मिश्र की धर्मपत्नी शैलजा मिश्रा को अपने पति के देशभक्त होने पर फख्र था. स्वतंत्रता संग्राम के दौरान शैलजा मिश्रा ने भी उनका जमकर साथ दिया और एक अर्द्धांगिनी का धर्म निभाया. सीवान व गोपालगंज के आजादी के दीवानों की बैठक उनके घर पर होती रहती थी.
12 दिसंबर 1995 को हुआ निधन
लंबे संघर्षपूर्ण जीवन के बाद स्वतंत्रता सेनानी सूरज मिश्र का निधन 12 दिसंबर 1995 को हो गया. आज भले ही स्वतंत्रता संग्राम के ऐसे कई वीर योद्धाओं की यादें धुंधली पड़ती जा रही हों, लेकिन सूरज मिश्र का योगदान आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणादायी है.
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