सीवान में भाई-बहन के अटूट प्रेम की अनोखी मिसाल है भीखाबांध का ‘भाई-बहन मंदिर’, दो वट वृक्षों में दिखता है स्वरूप

भीखाबांध गांव का भैया-बहिनी मंदिर भाई-बहन के प्रेम और त्याग का प्रतीक है। जानिए इस प्राचीन मंदिर का इतिहास और संरक्षण की मांग से जुड़ी पूरी जानकारी।

भीखाबांध गांव में स्थित ‘भैया-बहिनी मंदिर’ धार्मिक आस्था के साथ-साथ भाई-बहन के अटूट प्रेम, त्याग और समर्पण की अनूठी लोकगाथा को अपने भीतर समेटे हुए है. रक्षाबंधन के अवसर पर इस मंदिर की महत्ता और बढ़ जाती है. स्थानीय श्रद्धालुओं के अलावा दूर-दराज से भी लोग यहां पहुंचकर पूजा-अर्चना करते हैं और परिवार की सुख-शांति की कामना करते हैं.

मुगलकाल की लोककथा से जुड़ा है इतिहास

स्थानीय लोगों के अनुसार, मुगल शासनकाल में एक भाई अपनी बहन की विदाई के बाद उसे डोली में लेकर भभुआ स्थित अपने घर जा रहा था. डोली जब भीखाबांध गांव के समीप पहुंची, तो कुछ मुगल सिपाहियों की नजर बहन पर पड़ी. लोकमान्यता के अनुसार, सिपाहियों ने डोली रोककर बहन के साथ दुर्व्यवहार का प्रयास किया. बहन की रक्षा के लिए भाई ने साहस के साथ सिपाहियों का सामना किया. जब परिस्थितियां विकट हो गयीं तो बहन ने भगवान से अपनी रक्षा की गुहार लगायी. मान्यता है कि उसी समय धरती फट गयी और भाई-बहन उसमें समा गये. उनके साथ चल रहे कुम्हारों ने भी अपने प्राण त्याग दिये। इस घटना की लोकगाथा ने कालांतर में इस स्थान को आस्था का प्रमुख केंद्र बना दिया.

दो वट वृक्ष बने भाई-बहन की पहचान

मंदिर की सबसे खास पहचान यहां मौजूद दो प्राचीन वट वृक्ष हैं. स्थानीय मान्यता है कि जिस स्थान पर भाई-बहन धरती में समाये थे, वहीं बाद में दो वट वृक्ष उत्पन्न हुए. आज भी इन दोनों वृक्षों को भाई और बहन का प्रतीक माना जाता है. वृक्षों की शाखाएं जिस तरह एक-दूसरे की ओर फैली हुई हैं, श्रद्धालु उसे भाई-बहन के प्रेम, संरक्षण और आत्मीयता का प्रतीक मानते हैं. सोनार समाज के लोगों की भी इन वट वृक्षों के प्रति विशेष आस्था है. रक्षाबंधन से दो दिन पूर्व समाज की ओर से यहां विशेष पूजा-अर्चना की जाती है. वहीं रक्षाबंधन के दिन भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर पहुंचते हैं और पूजा कर सुख-समृद्धि एवं मनोकामना पूर्ति की प्रार्थना करते हैं.

पांच बीघे में फैला था परिसर, अब कुछ कट्ठों में सिमटा

ग्रामीणों के अनुसार, एक समय भैया-बहिनी मंदिर और उसके आसपास का वट वृक्ष करीब पांच बीघा क्षेत्र में फैला हुआ था. विशाल परिसर स्थानीय लोकसंस्कृति और धार्मिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता था. लेकिन समय के साथ मंदिर की जमीन का स्वरूप बदलता गया और इसका मूल क्षेत्र सिमटकर कुछ कट्ठों तक रह गया. ग्रामीणों का आरोप है कि प्रशासनिक स्तर पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिये जाने तथा जनप्रतिनिधियों की उदासीनता के कारण मंदिर परिसर की जमीन पर धीरे-धीरे विभिन्न निर्माण हो गये. निजी विद्यालय, उच्च विद्यालय, पंचायत भवन और दुकानों के निर्माण से मंदिर के मूल स्वरूप पर असर पड़ा है. ग्रामीणों का कहना है कि अतिक्रमण के कारण न केवल मंदिर की ऐतिहासिक पहचान प्रभावित हो रही है, बल्कि पुराने वट वृक्षों का क्षेत्र भी लगातार सीमित होता जा रहा है.

सीमांकन और संरक्षण की उठ रही मांग

स्थानीय लोगों ने प्रशासन से मंदिर परिसर की जमीन का सीमांकन कर वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने की मांग की है. उनका कहना है कि यदि सरकारी या सार्वजनिक भूमि पर अतिक्रमण पाया जाता है तो नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए. साथ ही प्राचीन वट वृक्षों को संरक्षित करने के लिए भी ठोस कदम उठाने की जरूरत है.

संरक्षण नहीं मिला तो सिर्फ लोककथा बनकर रह जायेगी धरोहर

मंदिर से जुड़े लोगों का कहना है कि भाई-बहन के प्रेम और त्याग की यह कहानी पीढ़ियों से लोगों की आस्था का हिस्सा बनी हुई है. इसलिए इस स्थल का संरक्षण केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि क्षेत्र की लोकसंस्कृति और ऐतिहासिक विरासत को बचाने के लिए भी जरूरी है. ग्रामीणों ने प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से मंदिर की जमीन के संरक्षण, अतिक्रमण हटाने, वट वृक्षों की सुरक्षा और परिसर के विकास की मांग की है.

धार्मिक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की मांग

ग्रामीणों और श्रद्धालुओं का मानना है कि भैया-बहिनी मंदिर को धार्मिक एवं सांस्कृतिक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जा सकता है. मंदिर का सौंदर्यीकरण, प्राचीन वट वृक्षों का संरक्षण, परिसर का विकास और लोककथा से जुड़ी जानकारी प्रदर्शित करने से यह स्थान पर्यटकों और श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बन सकता है. भाई-बहन के पवित्र रिश्ते की अनोखी लोकगाथा को समेटे यह मंदिर आज संरक्षण की बाट जोह रहा है. समय रहते पहल हुई तो भीखाबांध की यह धरोहर आने वाली पीढ़ियों के लिए भी आस्था, प्रेम और त्याग की जीवंत मिसाल बनी रह सकती है.


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लेखक के बारे में

By रवींद्र गुप्ता

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