Maharajganj 27 Freedom Fighters : सीवान जिले के महाराजगंज प्रखंड का बंगरा गांव स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में खास पहचान रखता है. इस गांव की मिट्टी ने एक-दो नहीं, बल्कि 27 स्वतंत्रता सेनानियों को जन्म दिया. आज इनमें केवल 97 वर्षीय मुंशी सिंह जीवित बताए जाते हैं. बाकी सेनानियों की यादें एक छोटे से पत्थर पर दर्ज नामों तक सिमटती जा रही हैं, जबकि उनके संघर्ष और बलिदान की कहानी आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा है.
27 स्वतंत्रता सेनानियों की धरती है बंगरा
महाराजगंज प्रखंड का बंगरा गांव आजादी के आंदोलन में अपनी अहम भूमिका के लिए जाना जाता है. स्थानीय लोगों के अनुसार गांव से 27 स्वतंत्रता सेनानियों ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष किया. देश की आजादी के लिए इन लोगों ने जेल, यातना और आर्थिक नुकसान तक सहा, लेकिन पीछे नहीं हटे.
आज सिर्फ एक स्वतंत्रता सेनानी जीवित
इन 27 स्वतंत्रता सेनानियों में अब केवल वयोवृद्ध मुंशी सिंह जीवित हैं. वह करीब 97 वर्ष के हैं और स्वतंत्रता सेनानी जिला संघ के अध्यक्ष भी रह चुके हैं. उम्र के इस पड़ाव पर भी उन्हें आजादी के आंदोलन के वे दिन याद हैं, जब युवाओं में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ जबरदस्त जुनून था.
एक छोटे पत्थर पर सिमट गई सेनानियों की याद
स्थानीय लोगों का कहना है कि बंगरा के स्वतंत्रता सेनानियों की स्मृति को जिस तरह संरक्षित किया जाना चाहिए था, वैसा नहीं हो सका. सिहौता बंगरा उच्च विद्यालय के परिसर में एक स्मृति स्थल के साथ छोटे से पत्थर पर 27 स्वतंत्रता सेनानियों के नाम अंकित हैं. ग्रामीणों की शिकायत है कि इन नामों के अलावा उनकी विस्तृत जानकारी और इतिहास को सुरक्षित रखने के लिए पर्याप्त व्यवस्था नहीं है.
प्रशासनिक रिकॉर्ड को लेकर भी उठ रहे सवाल
स्थानीय लोगों के अनुसार स्वतंत्रता सेनानियों की पूरी सूची और उनके योगदान से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक रूप से आसानी से उपलब्ध नहीं है. इससे नई पीढ़ी अपने ही गांव के उन लोगों के बारे में बहुत कम जान पा रही है, जिन्होंने देश की आजादी के लिए संघर्ष किया था.
सेनानियों के नाम भी अपने आप में इतिहास
बंगरा के स्वतंत्रता सेनानियों में शहीद देवशरण सिंह के अलावा रामलखन सिंह, टुकड़ सिंह, गजाधर सिंह, रामधन राम, रामपृत सिंह, सुंदर सिंह, रामपरीक्षण सिंह, शालीग्राम सिंह, गोरख सिंह, फेंकु सिंह, जुठन सिंह, काली सिंह, सूर्यदेव सिंह, बमबहादुर सिंह, राजनारायण उपाध्याय, रामएकबाल सिंह, तिलेश्वर सिंह, देवपूजन सिंह, रघुवीर सिंह, नागेश्वर सिंह, शिव कुमार सिंह, झूलन सिंह, राजाराम सिंह, सीताराम सिंह और सुरेन्द्र प्रसाद सिंह के नाम शामिल हैं.
शहीद देवशरण सिंह की शहादत ने बढ़ाया जोश
स्थानीय इतिहास के अनुसार शहीद देवशरण सिंह आजादी की लड़ाई में प्राणों की आहुति देने वाले बंगरा के पहले शहीद थे. उनकी शहादत ने गांव के युवाओं में अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष का जोश और बढ़ा दिया. इसके बाद भी गांव के कई लोगों ने आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई.
अंग्रेजों ने घर जला दिए, फिर भी नहीं टूटा हौसला
बंगरा के गोरख सिंह, सीताराम सिंह और राजाराम सिंह को अंग्रेज गिरफ्तार नहीं कर सके तो उनके घरों को आग के हवाले कर दिया गया. इसके बावजूद देश की आजादी के प्रति उनका संकल्प कमजोर नहीं हुआ. यह घटना उस दौर में ग्रामीण इलाकों में चल रहे स्वतंत्रता आंदोलन की तीव्रता को दिखाती है.
मुंशी सिंह को आज भी याद हैं आंदोलन के दिन
97 वर्षीय मुंशी सिंह बताते हैं कि उस समय क्षेत्र के युवाओं में देश को आजाद कराने का जुनून था. अंग्रेजों की गोली का डर भी उन्हें आंदोलन से पीछे नहीं हटा पाता था. स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के मौके पर पुरानी यादें उनके सामने फिर जीवंत हो जाती हैं.
फुलेना प्रसाद की शहादत आज भी भावुक करती है
मुंशी सिंह बताते हैं कि वह शहीद फुलेना प्रसाद की शहादत को आज भी नहीं भूल पाए हैं. हर साल फुलेना प्रसाद स्मारक पर झंडोत्तोलन के दौरान वह भावुक हो जाते हैं. उनका कहना है कि आजादी के आंदोलन में शामिल लोगों की सोच देश और समाज के लिए समर्पित थी.
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बाल बंगरा के फुलेना प्रसाद ने दी शहादत
बंगरा से कुछ दूरी पर स्थित बाल बंगरा के शहीद फुलेना प्रसाद भी स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख नामों में शामिल रहे. भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान 16 अगस्त 1942 को महाराजगंज में अंग्रेजों की गोली से उनकी मौत हुई थी. उनकी शहादत के बाद उनकी पत्नी तारा देवी ने आंदोलन का नेतृत्व संभाला. करीब छह वर्ष पहले तारा देवी का निधन हुआ.
उमाशंकर प्रसाद के खिलाफ अंग्रेजों ने जारी किया था आदेश
महाराजगंज के उमाशंकर प्रसाद भी स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रहे. वर्ष 1942 में अंग्रेजी हुकूमत ने उन्हें देखते ही गोली मारने का आदेश जारी कर दिया था. इसके बाद वह भूमिगत हो गए और आंदोलन से जुड़े लोगों को आर्थिक मदद पहुंचाते रहे.
स्कूल में लगाई आग और दुकान लूट ली
उमाशंकर प्रसाद की गतिविधियों से नाराज अंग्रेज सैनिकों ने उनके द्वारा स्थापित उमाशंकर प्रसाद हाई स्कूल में आग लगा दी और उनकी दुकान लूट ली. परिवार के अनुसार उन्होंने आजादी के बाद देशहित में मुआवजा लेने से भी इनकार कर दिया था.
गांधी से प्रभावित थे उमाशंकर प्रसाद
उमाशंकर प्रसाद के पौत्र इंजीनियर प्रमोद रंजन के अनुसार वर्ष 1927 में महात्मा गांधी महाराजगंज पहुंचे थे. उस दौरान उमाशंकर प्रसाद ने उन्हें 1,001 रुपये की थैली भेंट की थी, ताकि स्वतंत्रता आंदोलन में आर्थिक मदद मिल सके. उन्होंने अपनी जमीन का बड़ा हिस्सा स्कूल, अस्पताल और अन्य सार्वजनिक संस्थानों के लिए दान किया था.
राजेंद्र प्रसाद के साथ नमक आंदोलन में लिया हिस्सा
परिवार के अनुसार उमाशंकर प्रसाद ने देशरत्न डॉ. राजेंद्र प्रसाद के साथ नमक आंदोलन में भी हिस्सा लिया था. स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी सक्रियता और सामाजिक योगदान के कारण उन्हें महाराजगंज का गांधी और मालवीय भी कहा जाता था.
आजादी की विरासत को बचाने की जरूरत
बंगरा गांव के 27 स्वतंत्रता सेनानियों की कहानी सिर्फ स्थानीय इतिहास नहीं है. यह उस दौर की याद दिलाती है जब सामान्य परिवारों के लोगों ने देश की आजादी के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था. ग्रामीणों का कहना है कि स्मृति स्थल का संरक्षण, सेनानियों की विस्तृत सूची और उनके योगदान का दस्तावेजीकरण होने से नई पीढ़ी इस विरासत से जुड़ सकेगी.
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