सीवान : उन्नत तकनीक से छोटे किसान भी मछलीपालन कर समृद्ध बन सकते है. दिन व दिन मछली की बढ़ती खपत को देखते हुए मछली उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए नयी तकनीक को मछली पालक अपना रहे है. कम पानी और कम खर्च में अधिक से अधिक मछली उत्पादन करने के लिए जिले के मत्स्यपालकों को बायोफ्लॉक एवं आरएएस सिस्टम के तरफ झुकाव देखने को मिल रहा है.
जिले के गोरेयाकोठी प्रखंड के महमदपुर पट्टी निवासी पूर्व सैनिक अनिल रंजन इन दिनों शहर के महादेवा मिशन स्थित अपने आवास पर बायोफ्लॉक सिस्टम से मछली पालन करने में जुटे है. उन्होंने इस विधि को इंटरनेट के माध्यम से सिखने के बाद धरातल पर उतारने का काम किया है.
इनके द्वारा किये गये इस प्रयास की चर्चा पूरे जिले में जोर-छोर से चल रही है. क्योंकि एक टैंक से निकला पानी दूसरे में काम आ जायेगा.
घर के कमरे व छत पर कर रहें मछलीपालन
बायोफ्लॉक एवं आरएएस सिस्टम से हर जगह होने लगा है मछलीपालन
अपशिष्टों को भोजन में बदलने की अपनायी जाती है तकनीक
बायोफ्लॉक एवं आरएएस सिस्टम से मछली पालन करने के दौरान अपशिष्टों को भोजन में बदलने की तकनीक को अपनाया जाता है. मछली पालन में सबसे ज्यादा खर्च चारा पर ही मत्स्य पालकों का होता है. इसके लिए बेनीफिशियल बैक्टीरिया डाला जाता है. इससे मछलियों के दाने पर हो रहा खर्च काफी कम हो जाता है. सामान्य तौर पर दिन भर में मछलियों को दो बार दाना डालना पड़ता है.
प्लास्टिक शीट में कर रहे है मछलीपालन
पूर्व सैनिक अनिल रंजन बिना तालाब खोदे ही घर के एक कमरे में मछलीपालन प्लास्टिक सीट में कर रहे है. इसमें करीब दस हजार लीटर पानी की आवश्यकता पड़ती है. उन्होंने इस तकनीक से मछलीपालन करने के लिए कोई प्रशिक्षण विभाग से नहीं लिया था.
उन्होंने बताया है कि सबसे पहले इस विधि को इंटरनेट के माध्यम से देखा था. इसके बाद सोच आयी कि क्यों नहीं अपने एक छोटा सा कमरे में ही मछली पालन करे और इस दिशा में कार्य शुरू कर दिया जो लगातार जारी है.
जिले में मत्स्यपालकों को लगातार मछली उत्पादन के संबंध में प्रशिक्षण दिया जाता है. उन्नत तकनीक से मछली पालन कर किसान समृद्ध भी हो रहे है.
डॉ जयशंकर ओझा, जिला मत्स्य पदाधिकारी, सीवान
