प्रशासन का अभियान नहीं आया काम, मजदूर जा रहे पंजाब

सीतामढ़ी : लोकसभा चुनाव की अपेक्षा विधानसभा चुनाव में वोट का प्रतिशत और अधिक बढ़ाने के लिए राज्य निर्वाचन आयोग के निर्देश पर प्रशासन द्वारा तरह-तरह के कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं. लक्ष्य शत-प्रतिशत वोटिंग कराने का है. इधर ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार नहीं मिलने से प्रतिदिन सैकड़ों मजदूर पंजाब व अन्य प्रदेशों में कमाने […]

सीतामढ़ी : लोकसभा चुनाव की अपेक्षा विधानसभा चुनाव में वोट का प्रतिशत और अधिक बढ़ाने के लिए राज्य निर्वाचन आयोग के निर्देश पर प्रशासन द्वारा तरह-तरह के कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं.

लक्ष्य शत-प्रतिशत वोटिंग कराने का है. इधर ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार नहीं मिलने से प्रतिदिन सैकड़ों मजदूर पंजाब व अन्य प्रदेशों में कमाने के लिए पलायन कर रहे हैं.

इससे यह माना जा रहा है कि वोट का प्रतिशत बढ़ाने के प्रशासन के अभियान को धक्का लगेगा. गांव में नहीं मिलता कामपंजाब जाने को स्थानीय रेलवे स्टेशन पहुंचे बेला थाना क्षेत्र के खैरवा गांव निवासी नंदलाल महतो, गरीब दास, गेना साह, सोगारथ साह, नागेश्वर राम व बच्चू महतो ने बताया कि काम की तलाश में प्रतिदिन चौक पर बैठे रहते हैं,

लेकिन कोई पूछने वाला नहीं है. यहां बैठ कर समय बीताने से बेहतर है कि बाहर जाकर कमाये. बताया कि आर्थिक स्थिति कमजोर होने के चलते तब बाहर जाने की नौबत आयी है, जब बच्चों के समक्ष भूखमरी की स्थिति उत्पन्न हुई है. गरीबी से संबंधित बातों को कहते-कहते बच्चू महतो भावुक हो गये और उनकी आंखें भर आयी.

मजदूरों का कहना था कि पेट की भूख शांत करने के साथ ही पर्व व त्योहार में होने वाले खर्च की पूर्ति के लिए बाहर जाना पड़ रहा है. खेतों को सिंचाई सुविधा नहींमजदूरों ने बताया कि उनके गांव का क्षेत्र नेपाल बॉर्डर से सटा हुआ है.

थाना क्षेत्र में कभी छह नदियां बहती थी. इनमें हल्दी, मरहा, सोनी, गुरी, बरबे व घिभी आदि शामिल हैं. इन नदियों से खेतों को सिंचाई मिलती थी और फसले हमेशा हरा-भरा रहती थी. क्षेत्र में दो नलकूप भी था.

नदी में पानी कम होने पर नलकूप से सिंचाई की जाती थी. तब क्षेत्र के मजदूरों को बाहर नही जाना पड़ता था. बाद के दिनों में चार नदी पानी विहीन हो गयी और नलकूप भी बंद हो गया. धान की कटनी को जा रहेमजदूरों ने बताया कि पंजाब में धान की कटनी शुरू हो गयी है. वे लोग भी इसी काम से जा रहे है. वहां दैनिक मजदूरी नही, बल्कि ठेका पर धान की कटनी की जाती थी. एक मजदूर प्रतिदिन करीब सात सौ रुपये कमा लेता है. एक माह में 20 से 25 हजार कमाई हो जाती है.

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