रक्षाबंधन का इतिहास: कृष्ण-द्रौपदी से टैगोर तक, जानिए राखी के धागे की पूरी कहानी

रक्षाबंधन का पर्व केवल भाई-बहन का रिश्ता नहीं, बल्कि पौराणिक कथाओं और सामाजिक एकता का प्रतीक है। जानिए राखी के पीछे की सदियों पुरानी परंपरा और इतिहास।

RakshaBandhan 2026 : रक्षाबंधन को आमतौर पर भाई-बहन के प्रेम और सुरक्षा के वचन से जुड़े पर्व के रूप में जाना जाता है, लेकिन इसकी कहानी केवल पारिवारिक रिश्ते तक सीमित नहीं है. पौराणिक कथाओं से लेकर इतिहास और सामाजिक आंदोलनों तक राखी के अलग-अलग रूप देखने को मिलते हैं. भगवान कृष्ण और द्रौपदी की कथा हो, रानी कर्णावती और हुमायूं का चर्चित प्रसंग या 1905 के बंगाल विभाजन के दौरान रवींद्रनाथ टैगोर की पहल, हर जगह राखी के धागे में रक्षा, विश्वास और एकता का भाव नजर आता है.

कृष्ण-द्रौपदी की कथा में दिखा रक्षा और स्नेह का भाव

रक्षाबंधन से जुड़ी सबसे लोकप्रिय पौराणिक मान्यताओं में श्रीकृष्ण और द्रौपदी का प्रसंग प्रमुख है. मान्यता है कि श्रीकृष्ण की उंगली में चोट लगने पर द्रौपदी ने अपनी साड़ी का कपड़ा फाड़कर उनकी उंगली पर बांध दिया था. इसके बाद श्रीकृष्ण ने द्रौपदी की रक्षा का वचन दिया. हालांकि इस प्रसंग को आधुनिक रक्षाबंधन की शुरुआत का ऐतिहासिक प्रमाण नहीं माना जाता, लेकिन यह स्नेह, अपनापन और रक्षा के भाव को जरूर सामने रखता है.

सिकंदर और राजा पुरु की कहानी कितनी ऐतिहासिक है?

राखी से जुड़ी एक चर्चित कथा सिकंदर की पत्नी और भारतीय शासक राजा पुरु से भी संबंधित है. प्रचलित कहानी के अनुसार सिकंदर की पत्नी ने राजा पुरु को राखी भेजकर उन्हें अपना भाई बनाया था. इसके बाद सिकंदर और पुरु के बीच युद्ध हुआ. कहा जाता है कि पुरु ने राखी के रिश्ते का सम्मान करते हुए सिकंदर को जीवनदान दिया. हालांकि इस घटना के समर्थन में ठोस ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं. इसलिए इसे प्रमाणित इतिहास के बजाय प्रचलित ऐतिहासिक कथा के रूप में देखना उचित है.

1905 में राखी बनी हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक

रक्षाबंधन के इतिहास में 1905 का बंगाल विभाजन भी महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है. ब्रिटिश शासन के फैसले के विरोध में रवींद्रनाथ टैगोर ने राखी को सामाजिक एकता और भाईचारे के प्रतीक के तौर पर इस्तेमाल करने का आह्वान किया. प्रचलित विवरणों के अनुसार लोगों ने एक-दूसरे की कलाई पर राखी बांधकर एकता और सद्भाव का संदेश दिया. इस तरह राखी का भाव परिवार की सीमा से आगे बढ़कर सामाजिक एकता और राष्ट्रीय भावना से जुड़ गया.

दूरी बढ़ी, लेकिन रिश्ते की मिठास आज भी कायम

बदलते समय में पढ़ाई और रोजगार के कारण भाई-बहन अक्सर अलग-अलग शहरों में रहने लगे हैं. इसके बावजूद रक्षाबंधन का भाव कमजोर नहीं हुआ है. कहीं बहन डाक या ऑनलाइन माध्यम से राखी भेजती है, तो कहीं वीडियो कॉल के जरिए भाई की कलाई पर राखी बांधने की रस्म निभाई जाती है. राखी के धागे में बचपन की यादें, साथ बिताए पल और सुख-दुख में एक-दूसरे के साथ खड़े रहने का भरोसा आज भी जुड़ा है.

एक धागा, कई रिश्ते और एक बड़ा संदेश

रक्षाबंधन की परंपरा को देखें तो यह सिर्फ एक धागा बांधने का पर्व नहीं है. इसमें पौराणिक आस्था, भाई-बहन का प्रेम, सुरक्षा का वचन, सामाजिक सद्भाव और एकता जैसे कई भाव समाहित हैं. यही वजह है कि रक्षाबंधन आज भी भारतीय संस्कृति का ऐसा पर्व है, जो एक कलाई पर बंधकर रिश्तों को मजबूत करता है और अपने संदेश से पूरे समाज को जोड़ने की प्रेरणा देता है.


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By Prabhat khabar news desk

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