सारण: अमनौर के शहीद जयमंगल महतो की कहानी, 20 अगस्त 1942 को तीर-धनुष लेकर अंग्रेजी फौज से अकेले लिया था लोहा

20 अगस्त 1942 को अमनौर के लाल जयमंगल महतो ने अकेले ही तीर-धनुष से ब्रिटिश फौज का सामना किया. भारत छोड़ो आंदोलन में उनके बलिदान की यह अविस्मरणीय गाथा देश की आजादी के संघर्ष को दर्शाती है.

Saran Remembering jaymangal mahto: 20 अगस्त 1942 अमनौर की धरती ने इसी दिन अपने एक और लाल को खोया था. नाम था जयमंगल महतो. भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जब अंग्रेजी फौज क्रांतिकारियों को दबाने के लिए अमनौर की ओर बढ़ी, तो ग्रामीणों के भाग जाने के बाद भी जयमंगल महतो पीछे नहीं हटे. हाथ में तीर-धनुष लेकर उन्होंने अकेले ही ब्रिटिश फौज का सामना किया और गोलियां लगने से वीरगति को प्राप्त हुए.

18 अगस्त की घटना से शुरू हुई शहादत की कहानी

जयमंगल महतो की शहादत की कहानी 18 अगस्त 1942 की घटना से जुड़ी है. भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान मढ़ौरा के महथा गाछी में सभा चल रही थी. इसी दौरान हथियारबंद ब्रिटिश फौज ने सभा पर गोलियां चलानी शुरू कर दीं.

इसी बीच वीरांगना बहुरिया रामस्वरूपा देवी ने लोगों का हौसला बढ़ाते हुए ललकार लगायी. उनकी आवाज सुनकर भागती भीड़ वापस लौटी. निहत्थे लोगों ने ईंट-पत्थरों से अंग्रेजी फौज का सामना किया. इस दौरान पांच गोरे सिपाहियों के मारे जाने की बात कही जाती है. इसी मुठभेड़ में गांव के नौजवान रामजीवन सिंह भी शहीद हो गये.

शवों को नारायणी-गंडक में डुबोने की बात

बताया जाता है कि घटना के बाद अंग्रेजी फौज ने अपने मारे गये सिपाहियों के शवों को बैलगाड़ी पर लादकर परशुरामपुर के पास नारायणी-गंडक नदी में डुबो दिया, ताकि घटना के सबूत मिटाये जा सकें. उस रात हुई बारिश का भी जिक्र स्थानीय लोगों की ओर से इस घटना की कहानी में किया जाता है.

क्रांतिकारियों ने तोड़ दिया मही नदी का पुल

अंग्रेजी फौज के आगे बढ़ने की आशंका के बीच क्रांतिकारियों ने अमनौर-मढ़ौरा को जोड़ने वाले मही नदी के पुल को ध्वस्त कर दिया. इसका उद्देश्य अंग्रेजी फौज को नदी पार करने से रोकना था. 20 अगस्त को जब ब्रिटिश सैनिकों ने मही नदी पार करने की कोशिश की, तो ग्रामीण डरकर वहां से भाग गये. लेकिन जयमंगल महतो ने पीछे हटने से इनकार कर दिया.

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गढ़ से तीर चलाते रहे जयमंगल महतो

मही नदी के किनारे स्थित गढ़ यानी ऊंचे टीले से जयमंगल महतो ने तीर-धनुष लेकर अकेले ही ब्रिटिश फौज का सामना किया. स्थानीय लोगों के अनुसार, उनके चलाये तीरों से कई अंग्रेजी सैनिक घायल हुए. इसके बाद आक्रोशित ब्रिटिश सैनिकों ने गोलियां चलानी शुरू कर दीं. गोलियां लगने से जयमंगल महतो वहीं शहीद हो गये. बताया जाता है कि अंग्रेजी फौज अपने मारे गये साथियों के संबंध में कोई सबूत तलाशने में सफल नहीं हो सकी.

आज भी सम्मान का इंतजार

अमनौर के लोगों के बीच आज भी बहुरिया रामस्वरूपा देवी और शहीद जयमंगल महतो की वीरगाथा याद की जाती है. स्थानीय लोगों का कहना है कि स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान देने वाले इन सपूतों को वह सम्मान नहीं मिला, जिसके वे हकदार थे.

जयमंगल महतो की शहादत भारत की आजादी के संघर्ष में अमनौर की भूमिका की याद दिलाती है. स्थानीय लोगों के अनुसार, तीर-धनुष जैसे पारंपरिक हथियारों के साथ भी क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश हुकूमत का सामना किया और देश की आजादी के लिए अपना जीवन न्योछावर कर दिया.

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By कुलदीप महासेठ

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