छपरा. एक दशक पहले तक छपरा शहर में ईद की तैयारी इत्र के बिना अधूरी मानी जाती थी. इत्र की खुशबू से पूरा माहौल महक उठता था, लेकिन समय के साथ ब्रांडेड सेंट्स, डियोड्रेंट्स और स्प्रे के बढ़ते प्रचलन ने इत्र की मांग को काफी कम कर दिया है. शहर के साहेबगंज क्षेत्र में इत्र बनाने वाले निर्माता जमील ने बताया कि कुछ साल पहले तक यहां पर आधा दर्जन इत्र बनाने की फैक्ट्रियां थीं, जिनमें काल्पी, शमीम और बनफूल जैसी ब्रांड्स काफी मशहूर थीं. काल्पी का इत्र पूरे बिहार के जिलों और पड़ोसी प्रदेशों में भी सप्लाई होता था. रमजान और ईद के मौके पर सीवान, गोपालगंज, हाजीपुर, मुजफ्फरपुर, बलिया जैसे शहरों के व्यापारी भारी मात्रा में होलसेल खरीदारी करते थे, लेकिन अब इत्र की मांग घटने के कारण कई फैक्ट्रियां बंद हो चुकी हैं और अब शहर में सिर्फ दो-तीन इत्र की दुकानें बची हैं.हालांकि, ईद के मौके पर शहर के खनुआ, गुदरी, ब्रह्मपुर, नगरा, मशरक, मढ़ौरा और आसपास के क्षेत्रों में अस्थायी इत्र स्टाल्स लगते हैं. ईद पर इत्र का एक खास महत्व होता है, खासतौर पर सुबह नये कपड़े पहनकर इत्र लगाने और फिर ईदगाह जाने की परंपरा है. इसके अलावा, जब लोग एक दूसरे के घर जाते हैं तो सेवइयों के साथ इत्र भी तोहफे के रूप में देने की परंपरा रही है.
मजमुआ इत्र की बढ़ती मांग
इत्र विक्रेता आलम ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों की तुलना में इस बार इत्र की बिक्री कम हुई है, लेकिन फिर भी कुछ लोग अभी भी मजमुआ 96, जन्नतुल फिरदौस जैसे लोकप्रिय ब्रांड्स की मांग कर रहे हैं. गर्मी के मौसम के कारण खस, मोगरा और रजनीगंधा के इत्र की भी मांग बढ़ी है. वहीं, कुछ शौकीन लोग उद, शमामा और गुलाब के इत्र की भी तलाश करते हैं. इस साल हिमाचल, मुंबई, कोलकाता और मध्यप्रदेश के रतलाम से भी दुकानदारों ने इत्र मंगवाए हैं.इत्र की खासियत
इत्र की खासियत यह है कि इसमें अल्कोहल का इस्तेमाल नहीं होता है, जो इसे अन्य परफ्यूम्स से अलग बनाता है. यही कारण है कि इत्र को नमाज अदा करने से पहले लगाने की परंपरा भी है. इसके अलावा, इत्र का इस्तेमाल आयुर्वेदिक और युनानी दवाओं में भी किया जाता है, और इसकी खुशबू के कारण इसे खाने में भी इस्तेमाल किया जाता है. इत्र को प्राकृतिक फूलों के अर्क से शुद्ध देसी तरीके से तैयार किया जाता है, और गुलाब जल, खस, मेहंदी, पामारोजा, नागरमोथा जैसे इत्र इसके सबसे लोकप्रिय प्रकार माने जाते हैं. हालांकि इत्र की पारंपरिक मांग में कमी आयी है, लेकिन ईद के मौके पर इसकी महक अब भी लोगों के दिलों में जिंदा है और यह एक महत्वपूर्ण परंपरा के रूप में कायम है.
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