सोनपुर मेला : गंगा-गंडक के संगम पर आस्था-लोक संस्कृति का महामिलन

गंगा और गंडक नदियों के संगम पर बसे सोनपुर की ओर जब आप निकलते हैं तो आपको आस्था से ओत-प्रोत लोग जेपी सेतु से उतरते ही दिखाई दे जाते हैं और उसके साथ ही लोक संस्कृति के वे रंग भी दिखने लगते हैं, जो यहां के मेले की खास पहचान रही है. पहलेजा घाट से […]

गंगा और गंडक नदियों के संगम पर बसे सोनपुर की ओर जब आप निकलते हैं तो आपको आस्था से ओत-प्रोत लोग जेपी सेतु से उतरते ही दिखाई दे जाते हैं और उसके साथ ही लोक संस्कृति के वे रंग भी दिखने लगते हैं, जो यहां के मेले की खास पहचान रही है. पहलेजा घाट से सात किमी दूर ही हिंदुओं का विश्व प्रसिद्ध हरिहरनाथ का मंदिर है.
यह दुनिया का इकलौता ऐसा मंदिर है, जहां श्री हरि विष्णु और हर हर महादेव स्थापित हैं. यह शैव और वैष्णव परंपरा मानने वालों की मिलन स्थली भी है, जो यह बताती है कि हरिहरनाथ की स्थापना ही विभिन्न विचारों के मिलन, एकता और बंधुत्व को बनाये रखने के लिए हुई थी. यही सोनपुर गज और ग्राह की उस लड़ाई की साक्षी भूमि भी है, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश निरंतर देती रहती है. कोनहारा घाट पर आस्था की डुबकी लगाने के लिए पहुंचे लोग आपको बता जाते हैं कि गंगा और गंडक के संगम पर किस प्रकार आस्था और लोक संस्कृति का महामिलन हो रहा है.
कानून और सामाजिक द्वंद्व में प्रभावित हो गया गाय का बाजार
गाय बाजार अब कानून और सामाजिक वैमनस्यता की मार झेल रहा है. 2017 में मेला शुरू होने के पहले सप्ताह में ही करीब 900 गायें निबंधित हुई थीं. लेकिन, इस बार उनकी संख्या सिर्फ 27 है. यह बड़ी गिरावट है, जिससे गायों का बाजार सिमट गया है.
इसके पहले बैल बाजार खत्म हो गया था, क्योंकि कृषि की नयी तकनीक और यंत्रों ने उसे लील लिया था. स्थानीय जितेंद्र सिंह बताते हैं कि गायों की संख्या इतनी घटी है कि हमलोगों को हैरत होती है. 2010 में 50 लाख रुपये की गायें बिकी थीं, जो रिकॉर्ड है. उस वक्त यहां देश के विभिन्न हिस्सों से गायें आती थीं. हरियाणा से आयी एक जर्सी गाय मेले की शान थी, जो पांच लाख रुपये में बिकी थी. वह 35 किलो दूध देती थी.
2004 में 354 हाथियों से सजा था मेला, इस साल एक भी नहीं
2004 में 345 हाथियों का बाजार इस मेले की शान हुआ करता था. उसी मेले में 50 लाख रुपये में एक हाथी बिका था. यह एक रिकॉर्ड था, जो अब भी बरकरार है. अब तो हाथियों का आना भी बंद हो गया, लेकिन यह अाधिकारिक तौर पर सबसे ज्यादा महंगे जानवर की बिक्री के रूप में निबंधित है.
2015 में 17 और 2016 में 13 हाथी यहां बिक्री के लिए आये थे. हालांकि, वह रिकाॅर्ड अब तक नहीं टूट सका. 2017 में एक हाथी आया और चला गया था और 2018 में भी वही क्रम बरकरार रहा है. हम जब पिछले साल भी यहां रिपोर्टिंग के लिए पहुंचे थे, तो केवल पहले शाही स्नान के दिन ही हाथी दिखाई दिया था, लेकिन इस बार वह भी नहीं.
63 इंच लंबी रानी घोड़ी की कीमत ‍Rs 15 लाख
डांस करने वाले घाेड़े-घोड़ी की जोड़ी देखेंगे तो मजा आ जायेगा
मेले में अभी डांस करने वाले घोड़े-घोड़ी की जोड़ी खास आकर्षण का केंद्र बनी हुई है. सीवान के शेखपुरा के मो इमाम खान यह जोड़ी लेकर पहुंचे हैं. इस जोड़ी में बादल घोड़ा और रानी घोड़ी है. दोनों के पैरों में घुंघरू लगा दीजिए और जगह दीजिए कि डांस शुरू. उन्हें इशारा करता है मो नौसेर, जो देखभाल भी करता है.
वह गाना भी सुनाता है और ठुमके लगाने को मजबूर भी करता है. उसने 63 ईंच लंबी रानी घोड़ी की कीमत 15 लाख रुपये रखी है और बादल घोड़े की कीमत सात लाख रुपये. कहता है कि यह घोड़ी खास है, क्योंकि 15 महीने में इतनी खूबसूरत घोड़ी ढूंढ़े भी नहीं मिलेगी और यह नाचती भी है. वह इसे दूध पिलाता है और घी भी. कैल्शियम की खुराक भी देता है. लोग इसे देखने के लिए दूर-दूर से आ रहे हैं.
एशिया के सबसे बड़े पशु मेले का संरक्षण आवश्यक
क जमाने में जंगी हाथियों के सबसे बड़े केंद्र सोनपुर मेले का इतिहास बड़ा ही भव्य है़ कहा जाता है कि सोनपुर मेला ऐसी जगह है, जहां सबकुछ बिकता था. हाथी जो अब सिर्फ तस्वीरों में बचे हैं, उनकी खरीदारी यहां बड़े पैमाने पर होती थी. यहां मौर्य वंश के संस्थापक चंद्रगुप्त, मुगल सम्राट अकबर और 1857 गदर के बिहारी नायक वीर कुंवर सिंह ने भी हाथी खरीदे थे.
1803 में गवर्नर रहे रॉबर्ड क्लाइव ने तो सोनपुर में बड़ा अस्तबल भी बनवाया था. लेकिन यह मेला अब मेकओवर की मांग कर रहा है. चिड़िया बाजार के पास युवा नेता विश्वजीत सिंह मिले़ उन्होंने सोनपुर मेले से जुड़ी एक पुरानी कहानी को उद्धृत करते हुए बताया कि अतीत में अक्सर जब इस मेले के ऊपर किसी तरह का संकट आया है, तब राजे-रजवाड़ों ने सहारा देकर इसकी अर्थव्यवस्था को गतिमान बनाये रखने में योगदान दिया.
एक बार मौर्य सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य ने इस मेले से 500 घोड़े खरीदे थेे. इसी तरह मुगल बादशाह औरंगजेब ने एक बार मेले पर छाये संकट को दूर करने के लिए यहां से दुर्लभ नस्ल वाले सफेद हाथी खरीद कर उन्हें शाही सेना में शामिल किया था. यह अजीब विडंबना है कि अब इस मेले के मूल को सरकार तहस-नहस होने से नहीं बचा रही है.
चिड़िया बाजार सूना : कभी यहां विदेशी पर्यटकों के लिए दूसरा बड़ा आकर्षण रहा पक्षी बाजार कुछ सालों से सूना पड़ा है. यहां एक से बढ़ कर एक पक्षी बिक्री के लिए लाये जाते थे. लेकिन अब न तो यहां पहले की तरह तोते की चटर-पटर और न ही मोर, गौरैया, मैना, साइबेरियन, पहाड़ी मैना, कोयल व अन्य पक्षियों का कलरव सुनाई दे रहा है. वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत पक्षी बाजार को बंद कर दिया गया है और इसी के साथ यहां का यह आकर्षण भी गायब हो गया है.
यादों के झरोखे से मेला
एक बैल बिकने पर मिलता था 11 रुपये कमीशन
मेले की कई यादें हैं मेरे जेहन में. 1967 में हमारी भूमिका लिखनी पांडे की हुआ करती थी. लिखनी पांडे वह व्यक्ति हुआ करता था, जो पशुओं की खरीद-बिक्री की लिखा-पढ़ी करता था और उसे इसके एवज में एक रुपया मिलता था. उसके लिए कितना उमंग हुआ करता था. एक रुपये में 250 ग्राम मार्टन टॉफी मिलती थी. मेला 25 वर्ग किमी में फैला हुआ था. 1000 से ज्यादा बैल बाजार में आते थे. अब यह बाजार खत्म हो गया. सुथनी बाजार भी था, लाठी बाजार और डगरा बाजार व मछली बाजार भी था.
टैक्स फ्री करने से लौट सकती है मेले की रौनक
सरकार यदि मेले में सभी कंपनियों को टैक्स फ्री सामग्री बेचने की अनुमति दे दे तो फिर इसकी रौनक बढ़ सकती है. पशु क्रूरता अधिनियम ने मेले के रंग और ढंग बदल दिये. बिहार सरकार ने जब इसे प्रभावी ढंग से लागू किया तो सोनपुर की पहचान हाथी, घोड़ा, पक्षी गायब होते गये. पंजाब से गायों-बैलों का आना बंद हो गया. बैल बाजार की बड़ी प्रसिद्धि थी. वह भी ट्रैक्टर के कारण खत्म होता गया. पिछले चार पांच सालों में पर्यटन विभाग द्वारा आयोजन के कारण स्थितियां बेहतर हुई हैं.
कभी यहां दूध की नदियां बहती थीं
यहां कभी 25 हजार गायें आया करती थीं.इतना दूध निकलता था कि यहां बाजार से एक चौथाई दर में दूध मिल जाता था. हमलोग पेड़े उसी समय बनवाते थे.
उस वक्त की मशहूर कलाकारा गुलाब बाई, नीलम बाई और संध्या-शोभा जैसे कलाकारों की प्रसिद्धी ताजा है, जो विशुद्ध थियेटर कलाकार थीं. उनके ड्रामे का क्या क्रेज था, हम बता नहीं सकते. अब एक दर्जन से ज्यादा फिल्मी नाच वाले थियेटर लग रहे हैं. अश्लीलता परोसने के कारण इन थियेटरों ने मेले को बदनाम भी किया है.

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