Samrat Choudhary: बिहार की राजनीति में एक नए युग का सूत्रपात हो चुका है. सम्राट चौधरी अब सूबे के मुख्यमंत्री की कमान संभाल चुके हैं, लेकिन सत्ता के इस शीर्ष तक पहुंचने का रास्ता जितना रोमांचक था, आगे का सफर उतना ही पथरीला नजर आता है.
नीतीश कुमार ने भले ही उन्हें अपना उत्तराधिकारी मानकर एनडीए की कमान सौंप दी हो, लेकिन 20 साल तक सुशासन बाबू की छवि के साथ राज करने वाले नीतीश की जगह लेना किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है.
भ्रष्टाचार का दीमक
बिहार में भ्रष्टाचार एक ऐसी समस्या रही है जो सरकारें बदलने के बावजूद जड़ें जमाए बैठी है. हाल के दिनों में बड़े अधिकारियों पर हुई छापेमारी इसका प्रमाण है. सम्राट चौधरी के लिए चुनौती यह है कि वे भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस की नीति को केवल कागजों तक सीमित न रखें.
सम्राट चौधरी ट्रांसपेरेंसी और CSR फंड के सही इस्तेमाल पर जोर देते हैं. उन्हें एक ऐसा नया मैकेनिज्म तैयार करना होगा जिससे सरकारी दफ्तरों में आम आदमी का काम बिना सुविधा शुल्क के हो सके.
कानून-व्यवस्था
नीतीश ने 2005 में सुशासन के नाम पर अपराध कम किया था, लेकिन आखिरी 5-6 साल में क्राइम ग्राफ फिर बढ़ गया. चिराग पासवान ने भी कहा था कि कानून-व्यवस्था पूरी तरह ढह गई है. हत्या, लूट, महिला अपराध की घटनाएं बढ़ीं. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की रिपोर्ट के मुताबिक, बिहार में 2025 में 2,556 हत्याएं हुईं, जो 2024 की तुलना में 8.3% कम थीं. जबकि महिला अपराध 2025 में 2,025 बलात्कार के मामले दर्ज किए गए.
अब तक सम्राट चौधरी होम मिनिस्टर थे, पुलिस और आंतरिक सुरक्षा संभाल रहे थे. BJP शासन में जीरो टॉलरेंस नीति लाने की संभावना ज्यादा है. अगर सुधरा तो महिलाओं और आम आदमी को राहत मिलेगी और निवेश आएगा. नहीं सुधरा तो NDA की ‘विकास’ वाली छवि खराब होगी और विपक्ष (RJD) हमला करेगा.
शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की खराब गुणवत्ता
बिहार में स्कूल-कॉलेज और अस्पताल भवन तो बने, लेकिन टीचर-डॉक्टर की कमी और यूनिवर्सिटीज खस्ताहाल रहीं. पटना मेडिकल कॉलेज जैसी पुरानी संस्थाएं टॉप पर नहीं रहीं. लड़कियों की साइकिल योजना सफल रही, लेकिन उच्च शिक्षा और अच्छे डॉक्टर नहीं मिले.
NDA में केंद्र से फंड और नीति सपोर्ट मिलेगा. वे बड़े प्रोजेक्ट्स की मॉनिटरिंग करते रहे हैं. गुणवत्ता सुधरी तो बिहार का ह्यूमन कैपिटल मजबूत होगा और युवा बाहर नहीं जाएंगे. नहीं सुधरा तो अगले चुनाव में झूठे वादे का आरोप लगेगा.
विवादों का साया
सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनते ही उनके अतीत के विवाद एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गए हैं. लालू-राबड़ी सरकार के दौरान कम उम्र में मंत्री बनने का मामला हो या उनकी शैक्षणिक डिग्रियों पर उठते सवाल, राष्ट्रीय जनता दल (RJD) ने उनके खिलाफ घेराबंदी तेज कर दी है.
तेजस्वी यादव के पास यह एक ऐसा अस्त्र है जिसे वे सदन से लेकर सड़क तक इस्तेमाल करेंगे. सम्राट के लिए सबसे बड़ी चुनौती इन व्यक्तिगत हमलों का ठोस जवाब अपने काम के जरिए देना होगा, ताकि जनता का ध्यान विवादों से हटकर विकास पर केंद्रित हो सके.
नीतीश की बड़ी लकीर और सुशासन का बोझ
नीतीश कुमार ने दो दशकों में बिहार में सुशासन की एक ऐसी लंबी लकीर खींची है, जिसे पार करना तो दूर, उसके बराबर पहुंचना भी बड़ी बात है. नीतीश के कार्यकाल में भ्रष्टाचार के व्यक्तिगत आरोपों का न होना उनकी सबसे बड़ी ताकत रही.
सम्राट चौधरी को न केवल अपराध नियंत्रण में अपनी धाक जमानी होगी, बल्कि पुलिस और प्रशासन की छवि को भी बेदाग रखना होगा. अगर उनके राज में क्राइम ग्राफ जरा भी ऊपर जाता है, तो सीधे तौर पर उनकी नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठेंगे.
यदि सम्राट चौधरी इन चुनौतियों को पार कर लेते हैं, तो उनका नाम बिहार के राजनीतिक इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हो सकता है. लेकिन अगर वे इसमें चूकते हैं, तो बीजेपी के लिए पहली बार मिली यह सत्ता का अवसर हाथ से फिसलने का खतरा भी बना रहेगा
