Pusa News: डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा के अधीन कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) बिरौली के वैज्ञानिक अब ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों के बागों का तकनीकी मार्गदर्शन कर रहे हैं. इसी क्रम में कृषि वैज्ञानिक डॉ. धीरू कुमार तिवारी ने गंगापुर पंचायत के श्रीरामपुर अयोध्या निवासी एवं सेवानिवृत्त वैज्ञानिक डॉ. नवल किशोर चौधरी के आम के बगीचे का तकनीकी भ्रमण कर वैज्ञानिक प्रबंधन के संबंध में महत्वपूर्ण सुझाव दिए.
तुड़ाई के बाद बाग का प्रबंधन है सबसे महत्वपूर्ण
डॉ. धीरू तिवारी ने कहा कि आम की तुड़ाई के तुरंत बाद बाग का वैज्ञानिक तरीके से प्रबंधन करना आवश्यक है. यही तय करता है कि अगले वर्ष पेड़ों पर कितने फल लगेंगे, उनकी गुणवत्ता कैसी होगी और रोग-कीटों का प्रकोप कितना रहेगा. उन्होंने किसानों से समय पर कटाई-छंटाई और आवश्यक कृषि कार्य करने की अपील की.
बिहार की उत्पादकता राष्ट्रीय औसत से अधिक
उन्होंने बताया कि भारत में लगभग 22.58 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में आम की खेती होती है, जिससे करीब 218.22 लाख मीट्रिक टन उत्पादन प्राप्त होता है. देश में आम की औसत उत्पादकता 9.7 टन प्रति हेक्टेयर है. वहीं बिहार में करीब 1.49 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में आम की खेती होती है और 24.43 लाख मीट्रिक टन उत्पादन प्राप्त होता है. राज्य की औसत उत्पादकता 16.37 टन प्रति हेक्टेयर है, जो राष्ट्रीय औसत से काफी अधिक है.
कटाई-छंटाई से बढ़ती है उत्पादन क्षमता
कृषि वैज्ञानिक ने बताया कि फलों की तुड़ाई के बाद बाग की अच्छी तरह जुताई करनी चाहिए. रोगग्रस्त, सूखी एवं क्षतिग्रस्त शाखाओं की छंटाई कर पेड़ों का आकार छाते जैसा बनाए रखना चाहिए. इससे सूर्य की रोशनी पेड़ की सभी शाखाओं और जमीन तक समान रूप से पहुंचती है, जिससे रोगों की संभावना कम होती है और फलन बेहतर होता है.
औजारों को करें कीटाणुरहित, घाव पर लगाएं बोर्डो पेस्ट
डॉ. तिवारी ने कहा कि छंटाई से पहले औजारों को ब्लीच के घोल या रबिंग अल्कोहल से कीटाणुरहित करना चाहिए, ताकि संक्रमण का खतरा न रहे. बड़ी शाखाओं की कटाई के बाद घाव पर बोर्डो पेस्ट लगाने की सलाह दी, जिससे संक्रमण से बचाव होता है और पेड़ स्वस्थ रहता है.
उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश और बिहार के कई किसान अभी भी नियमित रूप से बागों की कटाई-छंटाई नहीं करते हैं, जबकि वैज्ञानिक प्रबंधन अपनाने से उत्पादन, गुणवत्ता और लाभ तीनों में वृद्धि संभव है.
