समस्तीपुर: कृषि प्रधान जिला समस्तीपुर में पारंपरिक खेती के साथ अब बिना खेत वाली खेती यानी मशरूम उत्पादन किसानों और युवाओं के लिए आर्थिक समृद्धि का जरिया बन रहा है. डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा और राज्य के सभी 16 कृषि विज्ञान केंद्रों की ओर से दिये जा रहे वैज्ञानिक प्रशिक्षण से स्थानीय स्तर पर स्वरोजगार की नयी राह खुली है. बिहार पहले से ही देश में मशरूम उत्पादन के क्षेत्र में अग्रणी राज्यों में शामिल है और समस्तीपुर भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है.
बिना उपजाऊ जमीन के भी कर सकते हैं मशरूम की खेती
मशरूम उत्पादन की खासियत यह है कि इसके लिए उपजाऊ जमीन की जरूरत नहीं होती. इसे घर के भीतर, झोपड़ी या छोटे कमरों में भूसे और कृषि अवशेषों के माध्यम से उगाया जा सकता है.
बटन, ऑयस्टर और मिल्की मशरूम जैसी किस्मों का उत्पादन कम लागत में शुरू किया जा सकता है. जिले की जीविका दीदियां और ग्रामीण युवा 100 से 200 बैग से व्यवसाय शुरू कर आत्मनिर्भर बनने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं.
उत्पादन के साथ मार्केटिंग और प्रोसेसिंग पर जोर
मशरूम उत्पादन बढ़ने के साथ अब इसके विपणन और प्रसंस्करण पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है. मशरूम जल्दी खराब होने वाली फसल है, इसलिए इसके सही बाजार प्रबंधन को महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
स्थानीय बाजारों और होटलों में ताजे मशरूम की सीधी आपूर्ति के अलावा इसके मूल्यवर्धित उत्पाद भी तैयार किये जा रहे हैं. इनमें मशरूम पाउडर, बिस्कुट, पापड़, अचार और सूप मिक्स शामिल हैं. इससे मशरूम को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के साथ किसानों को बेहतर बाजार मिलने की संभावना बढ़ती है.
बेहतर पैकेजिंग और ब्रांडिंग से बढ़ेगी कमाई
मशरूम विशेषज्ञ डॉ. दयाराम समेत वैज्ञानिकों और कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, वैज्ञानिक तरीके से ग्रेडिंग, बेहतर पैकेजिंग और स्थानीय ब्रांडिंग के जरिये किसान बिचौलियों पर निर्भरता कम कर सीधे उपभोक्ताओं तक पहुंच सकते हैं.
सरकार और उद्यान विभाग की ओर से भी मशरूम उत्पादन के लिए सब्सिडी और वित्तीय सहायता उपलब्ध करायी जा रही है. उत्पादन के साथ आधुनिक विपणन तकनीकों को अपनाने पर समस्तीपुर में मशरूम कारोबार को और विस्तार मिलने की संभावना है.
यदि जिले के युवा उत्पादन के साथ मार्केटिंग और प्रोसेसिंग पर भी ध्यान दें तो समस्तीपुर भविष्य में मशरूम हब के रूप में अपनी पहचान मजबूत कर सकता है.
